|| काम करने का जूनून देखो तो मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों में देखो आ कर ||
मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों में काम करने का जूनून है | बहुत महनत करते हैं सभी | रात और दिन सिर्फ काम ही काम | ऑफिस मैं लोग ७-८ बजे आते है और जाने का कोई समय नहीं रात के ११ - १२ भी बज जाते कभी कभी तो और रोज ९-१० तो बज ही जाते हैं | सरकारी विभाग की तरह काम नहीं करते बल्कि एक व्यावसायिक कंपनी की तरह काम करते हैं | मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के ऑफिस आ कर देखो, इसकी किसी भी इकाई में जा कर देखो, और किसे भी रीजनल या सूचना केंद्र में जा कर देखो, ऐसा लगता है की किसी प्राइवेट बड़े व्यावसायिक कंपनी का ऑफिस / होटल है | एक क्रांति आ गयी है यहाँ पर सब तरह , वातावरण में, मानसिक स्तर पर और सोच में |
* फील्ड में प्रबधक लोगो का तो जवाब ही नहीं है | रात और दिन, बस काम ही काम |
* ऑफिस वालो को, रीजनल ऑफिस हो या हैड ऑफिसर हो और या हो सूचना केंद्र वहां उनको तो शनिवार - इतवार की छुट्टी तो मिल जाती है मगर इन प्रबंधको तो ज्यादा काम तो इन छुट्टियों में ही करना पड़ता है |
* दूसरी तरफ ऑफिस वालो को दस से पांच बजे तक की ड्यूटी और उसमें भी आधा घंटे काम लंच ब्रेक होता है ऑफिस में | ये तो नियम के अनुसार है काम करने के घंटे | अब इनसे पूछिए की ये ऑफिस वाले इन साडे छ: घंटे में कितना काम करते हैं ?
* मेरा मतलब यहाँ कहना यह नहीं कि ऑफिस वाले काम नहीं करते | मैं अपनी बात को फिर दोहराता हूँ की पर्यटन निगम के अधिकारी - कर्मचारी बहुत महनत करते हैं परन्तु फील्ड के लोग का जवाब नहीं वे रात और दिन बस काम ही काम लगा रहता है और वह भी बिना छुट्टी के | फील्ड वालों के लिए ७ घंटे का काम नहीं, कोई लंच ब्रेक भी नहीं है |
* प्रबंधक की जिम्मेदारियां तो असीमित हैं | कोई शिकायत होती है तो प्रबंधक का कसूर, किसी कर्मचारी ने कदाचरण कर दिया तो प्रबंधक का कसूर, इकाई में चोरी हो जावे तो प्रबंधक का कसूर, गुंडे लोग आ कर झगडा कर दें तो ये भी प्रबंधक का कसूर .................... जो भी कमी किसी भी प्रकार की अगर कमी या शिकायत हो जावे इकाई में बस प्रबंधक पकड़ लेते हैं उच्च अधिकारी लोग |
* और नियंत्रण अधिकारियों का सरकारी नियम के अनुसार उस पर इमानदारी से कार्यवाही करेंगे, उस में कोई छूट नहीं | नहीं देखेंगे कि उनका प्रबधक केई रातो से सोया तक नहीं है, रात को दो बजे तक पार्टी में व्यस्त रहा है, खाना खाया है कि नहीं | अब तो कदाचरण की धाराएँ लगाई जायेंगी |
* सौभाग्य वश एक परिवर्तन आया इस निगम में, फील्ड के लोगों के दर्द को समझने वाला एक वक्ती आया २००४ में | उसका नाम था श्री अश्वनी लोहानी - नए प्रबंध संचालक जो लगभग साडे पांच साल रहे इस निगम में |
* अब तो फील्ड के लोग अपने प्रबंध संचालक से सीधे बात कर सकते थे | बल्कि ये बात मुख्यालय में बैठे ऑफिसरों को और रीजनल मनाजरों को रास नहीं आयी थी | वे चाहते थे कि प्रबंधक लोग कोइ भी सीधे प्रबंध संचालक से बात नहीं करें, मगर कर कुछ नहीं सकते थे | अब तो मुस्किल ये कि अधिकारी लोग नाराज हो जाते मातहतों से |
* प्रथा ये थी कि प्रबधक सीधे एक ही व्यक्ति जो कि होटल ऑपरेशन का मुखिया था उसी से ही अपनी बात कहें और अपने हिसाब से जैसा चाहा उसी तरह प्रबंध संचालक को बात पहुंची | प्रबंधक को मालूम ही नहीं कि बात थी और क्या कही गयी प्रबंध संचालक के सामने | वाह क्या जमाना था वो भी | दूसरे अधिकारी भी उसी तरह ही काम करते थे, सच्ची बात तो पहुचती ही नहीं थी ऊपर प्रबंध संचालक को |
* यह व्यक्ति जो कि होटल ऑपरेशन का मुखिया ये भी नहीं चाहता था कि प्रबंधक रीजनल मनेजर से भी बात करे, बस औपचारिक रूप से सबंध बनाए रक्खे |
* हमारे प्रबंधकों को तो हमेसा राजनीति का सामना करना पडा है | और यह राज नीति कोइ और नहीं करता था, यह ऊपर से ही एक शाखा मुखिया ही करता था | प्रबंध के खिलाफ हमेसा इकाई के सभी कर्मचारियों कर दिया जाता था | यह मुखिया सीधे वेटर लोगों से, दूसरे किचेन स्टाफ, चौकीदार आदी से बात करता था और प्रबंधक कि हर हलचल पर नजर रखने को कहता था |
* इस व्यक्ति ने अपने जासूस छोड़े ही हुए थे प्रत्येक इकाई में | जो दिन भर कि खबर रखते थे | और प्रबंधकों में भी कुछ ख़ास थे जो हर घंटे कि खबर देते थे अपने आका को |
* और दूसरी तरफ रीजनल मनेजर भी प्रबधक के खिलाफ ! अब प्रबंधक कि क्या स्थिति होगी कोई भी अंदाजा लगा सकता है | इकाई में स्टाफ खिलाफ और रीजनल मनेजर भी खिलाफ |
* ऐसी विकट स्थिति में काम किया है हमारे प्रबंधकों ने | जहां दुसमन ही दुश्मन हों, मित्र कोइ नहीं | और जिसने अपनी जमीर बेच कर उस विशेस व्यक्ति की गुलामी स्वीकार कर ली वह तो फिर क्या कहिये सुख ही सुख है उसको | ऐसा माहौल रहा था एक जमाने में |
* पुन: धन्यवाद और सलाम उस महान हस्ती को, श्री लोहानी जी को जिसने पर्बंधकों को अपनी पहचान दी, उनको बोलने का अवसर दिया, काम करने का अपने विवेक से करने का अवसर दिया |
* आज प्रबंधक गण अपनी पहचान समझते हैं | दुगना काम करते हैं पहले से बहुत ज्यादा | आज कोई नियत्रण अधिकारी उनकों दबा नहीं सकता है | इस मानसिक स्वतन्त्रता का परिणाम ये हुआ है कि मध्य प्रदेश पर्यटन का नाम देश के प्रथम श्रेणी में गिना जाता है |
* जितनी भी इनाम मिले हैं, जो भी प्रगती की है उसका श्रेय हमारे पूर्व प्रबंध संचालक आदरणीय श्री अश्वनी लोहानी को तो जाता ही है | मगर श्री लोहानी जी के बनाए हुए रास्ते और उन पर चले वाले हमारे ये फील्ड के प्रबंधको का सबसे ज्यादा योगदान है |
* श्री लोहानी जी ने तो प्रशासन के साथ साथ अपने अधिकारों में आपस में पारिवारिक रिश्ते भी जोड़ दिये | एक नयी प्रथा थी यह | सभी सोचने लगे की ये क्या हो रहा है, कभी सोचा भी नहीं था की वरिष्ठ अधिकिरोयों के साथ जूनियर अधिकारी खाना भी खा सकते हैं | एक आश्चर्य था परन्तु एक दम सत्य |
* मैं वरिष्ठ अधिकारियों का विरिधी नहीं | बिना वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग के, बिना उनकी महनत के इन उचाईयों को छूना संभव भी नहीं होता | इनकी योजनायो, उनके रात दिन की महनत का काम ही रंग लाया है या सब |
* बल्कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की गलत अहम् के खिलाफ रहा हूँ सदा | आज भी हूँ | यह अहम् नहीं होता, ये आपसी राजनीति नहीं होती, ग्रुप बजी नहीं होती ३० साल पहले ही कुछ तस्वीर दूसरी ही होती | यह दुःख तो रहेगा सदा हमे |
* हमें अपना दुर्भाग्य महसूस हो रहा है बल्कि कमी महसूस हो रही है कि काश श्री लोहानी जी जैसे प्रबध संचालक पहले क्यों नहीं आये | इनको गुस्सा तो आता ही नहीं था | और मै समझता हूँ सबसे बड़ी शक्ति श्री लोहानी जी मैं थी वह थी "माफ़ करने की शक्ति" | ये ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी | आकास की ऊचाईयों तक पहुचाने वाले इस व्यक्ति के चहरे पर अहम् की एक झलक तक नहीं | मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का हर सदस्य (चाहे वह अधिकारी हो या कर्मचारी हो, चाहे वह कहीं भी पदस्थ हो ) श्री लोहानी जी को अपना समझता है | आप जीयो हजारों साल हमारे अपने आदरणीय श्री लोहानी जी, शत शत प्रणाम आपको |
बदन सिंह चौहान - रिटायर्ड जनरल मैनेजर (मध्य प्रदेश प्रदेश टूरिस्म निगम ) - अभी गुडगाँव में - मोबाइल नंबर 8800933250
Monday, May 30, 2011
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