Wednesday, September 5, 2018

लोगों से काम करना बड़ा कठिन होता है

लोगों से काम कराना बहुत कठिन होता है

पिछले महीने अगस्त में मेरी बेटी एकता ने, जो गुजरात के गांधीनगर मैं रहती है, मुझसे फोन किया कि उसको हांगकांग में नौकरी के लिए आवेदन करना है उसके लिए यूनिवर्सिटी से जहां जहां से भी उसने पढ़ाई की है वहां से उसके सर्टिफिकेट (जिसको ट्रांसक्रिप्ट कहते हैं) चाहिए ताकि वह एंबेसी में संबंधित को दिखाए जा सके। एकता ने ग्वालियर से BPED और MPED  किया है, जीवाजी यूनिवर्सिटी से और जबलपुर से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से BSC किया है और भोपाल से M.A. किया है इन तीनों विश्वविद्यालयों से उसके ट्रांसक्रिप्ट चाहिए। अब इतना आसान काम नहीं है। वैसे भी इस काम में देर लगती है । फिर भी मैंने कोशिश की कि मैं अपने संपर्क वालों से बात करूँ, वहां बैठे हुए लोगों से कहा जाए कि ये सर्टिफिकेट उपलब्ध करा देवें. भोपाल में मैंने होडल सिंह से कहा जो भोपाल यूनिवर्सिटी में कार्यरत है, वह जाट है, मेरा उससे संपर्क रहा है। उसने कहा मैं करा दूंगा। जबलपुर में मैंने मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के होटल में कलचुरी होटल में कार्यरत अपने संपर्क वाले व्यक्ति श्रीमती डॉली मैडम से कहा। उसने बड़े शौक से ही, बड़े रूचि लेकर कहा कि "सर मैं इस काम को जरूर करा दूंगी और उसने 4- 6 दिन में वह काम करा दिया। इसमें हमें कोई परेशानी नहीं है और बहुत ही रुचि ले कर उसने काम करा दिया। उसमें जितना खर्चा लगा मैंने उनसे उसका अकाउंट नंबर लिया और एकता को भेज दिया, एकता ने उसके पैसे भेज दिए कुल ₹1000 से भी कम खर्चा आया, उसको ₹1000 पूरा भेज दिया गया। उसका बहुत ही एहसान मानता हूं और वह इस काम को करने में बिल्कुल भी परेशान नहीं हुई। अब बात करते हैं होडल सिंह की। उसने पहले तो हां कर दी, फिर ध्यान नहीं दिया तो मैंने बार-बार कहा कि मैं दो-चार दिन में करा दूंगा मैं 'आज जाट सभा के चुनाव में लग रहा हूं, आज वह काम है, आज यह काम इस तरह उसने कई एक सप्ताह से ज्यादा इसी में काम में लगा दिए। मैंने सोचा काम जल्दी हो जाएगा तो मैबे सोचा कि किसी और व्यक्ति को बोलता हूं ताकि वह होडल सिंह से मिल ले। मैंने समर पाल चौहान से कहा।समर पाल चौहान मेरे संपर्क वाले हैं, वह भी मेरे साथ में मध्य प्रदेश टूरिज्म में काम करते थे। उसने होडल सिंह को फोन किया और कहा कि कितने पैसे जमा करने हैं मैं आ जाता हूं। उसने बताया कि ₹1500 लगेंगे। इधर एकता ने अपने साथ पढ़े हुए एक व्यक्ति को कहा जिसका नाम अमित रिछारिया है उसको भी कह रखा था। उसको होडल सिंह का नंबर दे दिया और वह होडल सिंह से संपर्क कर ले ताकि काम जल्दी हो जाए और कहा कि पैसे भर देना। अमित ने भी होडल सिंह से बात की। होटल सिंह नाराज हो गया की दो-दो लोगों को भी बोल दिया है और वह कह रहे हैं कि कितने पैसे भेजे हैं, कब आ जाएं, तो उसको लगा कि मैं उसके ऊपर विश्वास नहीं कर रहा हूं और लोगों को भी भेज रहे हैं, तो होडल ने मेरे को फोन किया और यह सब बातें बताई कि उसे अच्छा नहीं लगा कि मैंने अन्य दो लोगों को भी बोल दिया है, वे पूछ रहे हैं कि कितने पैसे लगेंगे, ऐसा समझा जा रहा है कि मैं पैसा ले कर काम करता हूँ। बड़ी मुश्किल से मैंने उसको मनाया और अपनी बात कही कि मैंने जल्दी करने के लिए इन लोगों से कह दिया था। तो बड़ी मुश्किल से उसको मना लिया। एक बार तो ऐसा लगा कि अब काम नहीं होगा। अंततः उसने कहा ठीक है मैं करा देता हूँ।उसने काम करा दिया मगर बहुत समय लिया। अब बात आती है ग्वालियर के काम की। ग्वालियर में सबसे पहले एकता ने बात की थी यूनिवर्सिटी में फिजिकल डिपार्टमेंट में प्रोफेसर डॉ केसर सिंह जी गुर्जर से। उसने कहा मैं करा देता हूँ। इसमें कोई समस्या नहीं है। एकता ने उसको व्हाट्सएप्प पर सारे डॉक्यूमेंट बीपीएड व एमपीएड के भेज दिए। उसके बाद एकता ने बार बार फोन किया तो डॉक्टर केशव सिंह जी ने फोन ही नहीं उठाया। इसके बाद मैंने एकता से पूछा कि डॉक्टर राजेंद्र सिंह गुर्जर से बात की जाए। एकता तो नहीं चाह रही थी कि उससे बात की जाए, पर मैंने कहा मैं उसको WhatsApp पर मैसेज देता हूँ, एकता ने कहा ठीक है। मैंने उनको मैसेज दिया, उसने मेरे को जवाब दिया कि कोई यहां आ जाए और यह पैसे भर दे तो यहां से काम करा कर ले जाए। एक बार तो उसने यह कह दिया था कि यह ऑनलाइन होता है जबकि मैंने चेक किया यह ऑनलाइन नहीं होता है । मैंने उसको यह बता दिया। तो उसका अर्थ मेरी समझ में आ गया कि वह नहीं कराएगा, जबकि उसके पास में बहुत स्टाफ है, छात्र हैं किसी को भी भेजकर यह काम करा सकता था, मगर नहीं कराया। इसके बाद मैंने एकता को बताया कि इस तरह का जवाब राजेंद्र सिंह ने दे दिया है। एकता ने कहा कि उसे डॉक्टर राजेन्द्र सिंह से ऐसी ही उम्मीद थी। फिर एकता ने अपने एक साथी श्री मोगे को बोला कि वह केशव सिंह से संपर्क करके यह काम करा ले। वह 2 दिन लगातार जाकर केशव सिंह क्या ऑफिस में जाकर बैठे रहे पर वह मिले ही नहीं। और इस प्रकार फिर कोई भी उम्मीद नहीं। फिर मैंने विश्वविद्यालय में अपने एक जानने वाले मित्र तेवतिया से बात की जो वहां असिस्टेंट रजिस्ट्रार है। उसने कहा आप एक दिन आ जाइए और हाथो हाथ लेकर चले जाइए। मैंने उनसे कहा मैं किसी को भेज देता हूं यहीं ग्वालियर से ही, उसने कहा ठीक है फिर जो मैंने एकता को कहा कि आप किसी को भेज दो। जो मोगे था वह तो बाहर गया हुआ था, एकता ने फिर एक दूसरे साथी श्री पांडे को कहा जो एकता का जूनियर था, उसने कहा मैं करा दूंगा। उसने जाकर तेवतिया से संपर्क किया। चालान बनवा कर पैसे भी भर दिए। विश्वविद्यालय से कुछ डॉक्यूमेंट लिए जो कि बाहर से टाइप कराना था उसे टाइप करा दिए।अब टाइप करा कर उसको विश्वविद्यालय जाना था, फो तीन दिन वहां जाकर लौट आया, फिर उसको बाहर जाना था और इस प्रकार देर हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी वह स्कूल में नौकरी करता था और स्कूल बंद होने के बाद 3:00 बजे के बाद ही विश्वविद्यालय जा सकता था। फिर मैंने किसी संपर्क वालों से कहा ग्वालियर में तानसेन होटल के मैनेजर श्री दंडोतिया से कहा कि मेरा काम करा दीजिए, उसने ना तो ना किया परंतु हां भी नहीं किया। उसने कोई ना कोई बहाना बनाया और चुप हो गया, उसने कोई रुचि नहीं ली। इसके बाद में डॉली मैडम ने जबलपुर से ग्वालियर फोन किया अंजू त्यागी को। उसने कहा मैं यह काम करा देती हूं तो त्यागी ने क्षेत्रीय कार्यालय में पदस्थ क्लर्क श्री इरसाद खान को बोला कि आप चौहान साहब का काम करा दीजिए। इसरार खान ने मुझे फोन किया, मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने उसको सब बता दिया कि आप पांडे जी से सारे पेपर ले लीजिए, एकता ने पांडे जी को भी बात कर ली थी और मैंने भी पांडे जी से बात कर ली थी, तो खान साहब ने सारे पेपर पांडे जी से ले लिए। पिछले 10 दिन से अब यह काम इसरार खान करा रहे हैं।उसने सारे काम करा लिए हैं बीच-बीच में चुप हो गया था, मेरा फोन भी नहीं उठाता था, मैसेज का जवाब भी नहीं देता था। एक बार फोन उठाया तो कभी कहा मैं बाहर गया हुआ था, कभी कहा कि यूनिवर्सिटी बंद है, अन्य कई बहाने।यह हालत हो गई कि क्या किया जाए, इसरार खान काम करा नहीं रहा है, वह गया जरूर था यूनिवर्सिटी, बीच-बीच में छुट्टी भी हो गई, मुझे पहले तो बताया था उसने कि मैंने तेवतिया से बात कर ली है, तेवतिया ने यह सब काम  कराने के लिए वहां संबंधित से कहा, कभी रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहा है, उसने स्वयं रिकॉर्ड रूम में जा कर देखा जो मिल गया था। भागदौड़ तो खान ने बहुत की है मगर काम तो पूरा नहीं हुआ। बीच में वह चुप ही हो गया।  एक हफ्ते तक चुप हो गया, मुझे बहुत चिंता हुई। होटल तानसेन का जो मैनेजर है श्री दंडोतिया उसने काम किया ही नहीं। वह मेरी बात नहीं मानता है और वहां का रीजनल मैनेजर है वीरेंद्र राणा वह मेरे नाम से वैसे ही काम कराना नहीं चाहेगा, मेरा फोन भी नहीं उठाता है। फिट 3 सितंबर को जन्माष्टमी के दिन श्री ओपी कपूर से बात की। श्री कपूर हमारे मध्य प्रदेश टूरिज्म में बॉस रहे हैं जबकि मेरा उनसे कोई अच्छा संबंध नहीं रहा, हमेशा बिगाड़ ही रहा है। उससे मैंने बात की, उसने कहा मैं राणा को बोल देता हूं। मुझे ऐसा लगता है उसने ने राणा से बात की होगी। 4 सितंबर को फिर खान साहब से बात हुई उसने फोन उठा लिया था। उसने कहा 'मैं कल जा रहा हूं,  कल वह गया भी था यूनिवर्सिटी।और आज 5 तारीख को भी वह गया था और जितने भी औपचारिकताएं है उसने पूरी की है । उसने आज मेरे को बताया कि वह तेवतिया से बात कर चुका है और संबंधित लिपिक से भी बात की है उसको लिफाफे दे दिए हैं । सब दस्तावेज दे दिए हैं और वह कल मुझे दे देगा, मगर कल ऐसा हो सकता है कि पूरे मध्यप्रदेश में पूरा प्रदेश बंद है, हड़ताल है, इसलिए कोई भी ऑफिस, दुकान कुछ नहीं खुलेगी, 144 धारा भी लगी हुई है। फिर भी खान ने कहा कि मैं फोन करूंगा उस संबंधित व्यक्ति को यूनिवर्सिटी में अगर वह ऑफिस आता है तो मैं कल उनसे यह संबंधित सर्टिफिकेट ले लूंगा। अगर मुझे नहीं लगता है कि वह कल ऑफिस आ पाएगा और कल हमारा काम हो पाएगा। मैंने कई लोगों को देखा है इस समय एक विजय अग्रवाल से भी मैंने बात करी थी ग्वालियर में वह हमारे साथ में अकाउंटेंट थे और बाद में ग्वालियर से रीजनल मैनेजर के पद पर रिटायर हुए हैं, उनसे भी मैंने बात की थी उसने हाँ हाँ करते हुए कहा 'कि मैं बीमार हूं, मैं करूंगा काम को, जाऊंगा यूनिवर्सिटी। फिर मैंने उनको बताया कि मेरा काम इसरार खान के पास में है, उसको आप कहते हैं, उसने कहा कि उस पर क्या भरोसा किया जा सकता है ! अग्रवाल ने खान को फोन किया और उसे कहा कि चौहान साहब का काम करा दीजिए। तो इस तरह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ग्वालियर में और किस तरह का संघर्ष मुझे भोपाल में करना पड़ा। एक बात तो है जब व्यक्ति नौकरी में रहता है अपने पद पर रहता है तो उस समय सारे काम दूर बैठे भी हो जाते हैं और नौकरी के बाद में फिर बहुत परेशानी होती है जहां अच्छे संपर्क भी होते हैं वह भी बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। तो इस प्रकार यह अनुभव हैं कि काम कराना बहुत मुश्किल है। बीच-बीच में तो मैं यह सोच रहा था कि मैं खुद चला जाऊं। यदि 1 दिन में काम हो जाएगा यह मुझे मालूम था कि नहीं होगा, इसलिए मैं नहीं गया। दूसरा होटल में ठहरा वहां तो बहुत खर्चा होगा, कई दिन रहना पड़ सकता है। 4 सितंबर को खान से बात भी की, उसने फोन उठा लिया था, उसने कहा लगभग सारा काम गया था और आज 5 तारीख को भी हो गया था। कल ऐसा हो सकता है कि पूरे मध्यप्रदेश में पूरा प्रदेश बंद है, हड़ताल है, इसलिए कोई भी ऑफिस दुकान कुछ नहीं खुलेंगे। 4 सितंबर को खान से बात भी की, उसने फोन उठा लिया था। मुझे नहीं लगता कि 6 तारीख को काम हो पाएगा क्योकि जब यूनिवर्सिटी खुलेगी ही नहीं तो कैसे काम होगा ! अब प्रतीक्षा है यूनिवर्सिटी खुलने की 7 सितंबर को और काम पूरे होने की आशा। धैर्य की भी एक सीमा होती है, परंतु रखना तो पड़ेगा ही।