Monday, May 30, 2011

|| काम करने का जूनून देखो तो मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों में देखो आ कर ||

|| काम करने का जूनून देखो तो मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों में देखो आ कर ||

मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों में काम करने का जूनून है | बहुत महनत करते हैं सभी | रात और दिन सिर्फ काम ही काम | ऑफिस मैं लोग ७-८ बजे आते है और जाने का कोई समय नहीं रात के ११ - १२ भी बज जाते कभी कभी तो और रोज ९-१० तो बज ही जाते हैं | सरकारी विभाग की तरह काम नहीं करते बल्कि एक व्यावसायिक कंपनी की तरह काम करते हैं | मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के ऑफिस आ कर देखो, इसकी किसी भी इकाई में जा कर देखो, और किसे भी रीजनल या सूचना केंद्र में जा कर देखो, ऐसा लगता है की किसी प्राइवेट बड़े व्यावसायिक कंपनी का ऑफिस / होटल है | एक क्रांति आ गयी है यहाँ पर सब तरह , वातावरण में, मानसिक स्तर पर और सोच में |

* फील्ड में प्रबधक लोगो का तो जवाब ही नहीं है | रात और दिन, बस काम ही काम |
* ऑफिस वालो को, रीजनल ऑफिस हो या हैड ऑफिसर हो और या हो सूचना केंद्र वहां उनको तो शनिवार - इतवार की छुट्टी तो मिल जाती है मगर इन प्रबंधको तो ज्यादा काम तो इन छुट्टियों में ही करना पड़ता है |
* दूसरी तरफ ऑफिस वालो को दस से पांच बजे तक की ड्यूटी और उसमें भी आधा घंटे काम लंच ब्रेक होता है ऑफिस में | ये तो नियम के अनुसार है काम करने के घंटे | अब इनसे पूछिए की ये ऑफिस वाले इन साडे छ: घंटे में कितना काम करते हैं ?
* मेरा मतलब यहाँ कहना यह नहीं कि ऑफिस वाले काम नहीं करते | मैं अपनी बात को फिर दोहराता हूँ की पर्यटन निगम के अधिकारी - कर्मचारी बहुत महनत करते हैं परन्तु फील्ड के लोग का जवाब नहीं वे रात और दिन बस काम ही काम लगा रहता है और वह भी बिना छुट्टी के | फील्ड वालों के लिए ७ घंटे का काम नहीं, कोई लंच ब्रेक भी नहीं है |
* प्रबंधक की जिम्मेदारियां तो असीमित हैं | कोई शिकायत होती है तो प्रबंधक का कसूर, किसी कर्मचारी ने कदाचरण कर दिया तो प्रबंधक का कसूर, इकाई में चोरी हो जावे तो प्रबंधक का कसूर, गुंडे लोग आ कर झगडा कर दें तो ये भी प्रबंधक का कसूर .................... जो भी कमी किसी भी प्रकार की अगर कमी या शिकायत हो जावे इकाई में बस प्रबंधक पकड़ लेते हैं उच्च अधिकारी लोग |
* और नियंत्रण अधिकारियों का सरकारी नियम के अनुसार उस पर इमानदारी से कार्यवाही करेंगे, उस में कोई छूट नहीं | नहीं देखेंगे कि उनका प्रबधक केई रातो से सोया तक नहीं है, रात को दो बजे तक पार्टी में व्यस्त रहा है, खाना खाया है कि नहीं | अब तो कदाचरण की धाराएँ लगाई जायेंगी |
* सौभाग्य वश एक परिवर्तन आया इस निगम में, फील्ड के लोगों के दर्द को समझने वाला एक वक्ती आया २००४ में | उसका नाम था श्री अश्वनी लोहानी - नए प्रबंध संचालक जो लगभग साडे पांच साल रहे इस निगम में |
* अब तो फील्ड के लोग अपने प्रबंध संचालक से सीधे बात कर सकते थे | बल्कि ये बात मुख्यालय में बैठे ऑफिसरों को और रीजनल मनाजरों को रास नहीं आयी थी | वे चाहते थे कि प्रबंधक लोग कोइ भी सीधे प्रबंध संचालक से बात नहीं करें, मगर कर कुछ नहीं सकते थे | अब तो मुस्किल ये कि अधिकारी लोग नाराज हो जाते मातहतों से |
* प्रथा ये थी कि प्रबधक सीधे एक ही व्यक्ति जो कि होटल ऑपरेशन का मुखिया था उसी से ही अपनी बात कहें और अपने हिसाब से जैसा चाहा उसी तरह प्रबंध संचालक को बात पहुंची | प्रबंधक को मालूम ही नहीं कि बात थी और क्या कही गयी प्रबंध संचालक के सामने | वाह क्या जमाना था वो भी | दूसरे अधिकारी भी उसी तरह ही काम करते थे, सच्ची बात तो पहुचती ही नहीं थी ऊपर प्रबंध संचालक को |
* यह व्यक्ति जो कि होटल ऑपरेशन का मुखिया ये भी नहीं चाहता था कि प्रबंधक रीजनल मनेजर से भी बात करे, बस औपचारिक रूप से सबंध बनाए रक्खे |
* हमारे प्रबंधकों को तो हमेसा राजनीति का सामना करना पडा है | और यह राज नीति कोइ और नहीं करता था, यह ऊपर से ही एक शाखा मुखिया ही करता था | प्रबंध के खिलाफ हमेसा इकाई के सभी कर्मचारियों कर दिया जाता था | यह मुखिया सीधे वेटर लोगों से, दूसरे किचेन स्टाफ, चौकीदार आदी से बात करता था और प्रबंधक कि हर हलचल पर नजर रखने को कहता था |
* इस व्यक्ति ने अपने जासूस छोड़े ही हुए थे प्रत्येक इकाई में | जो दिन भर कि खबर रखते थे | और प्रबंधकों में भी कुछ ख़ास थे जो हर घंटे कि खबर देते थे अपने आका को |
* और दूसरी तरफ रीजनल मनेजर भी प्रबधक के खिलाफ ! अब प्रबंधक कि क्या स्थिति होगी कोई भी अंदाजा लगा सकता है | इकाई में स्टाफ खिलाफ और रीजनल मनेजर भी खिलाफ |
* ऐसी विकट स्थिति में काम किया है हमारे प्रबंधकों ने | जहां दुसमन ही दुश्मन हों, मित्र कोइ नहीं | और जिसने अपनी जमीर बेच कर उस विशेस व्यक्ति की गुलामी स्वीकार कर ली वह तो फिर क्या कहिये सुख ही सुख है उसको | ऐसा माहौल रहा था एक जमाने में |
* पुन: धन्यवाद और सलाम उस महान हस्ती को, श्री लोहानी जी को जिसने पर्बंधकों को अपनी पहचान दी, उनको बोलने का अवसर दिया, काम करने का अपने विवेक से करने का अवसर दिया |

* आज प्रबंधक गण अपनी पहचान समझते हैं | दुगना काम करते हैं पहले से बहुत ज्यादा | आज कोई नियत्रण अधिकारी उनकों दबा नहीं सकता है | इस मानसिक स्वतन्त्रता का परिणाम ये हुआ है कि मध्य प्रदेश पर्यटन का नाम देश के प्रथम श्रेणी में गिना जाता है |
* जितनी भी इनाम मिले हैं, जो भी प्रगती की है उसका श्रेय हमारे पूर्व प्रबंध संचालक आदरणीय श्री अश्वनी लोहानी को तो जाता ही है | मगर श्री लोहानी जी के बनाए हुए रास्ते और उन पर चले वाले हमारे ये फील्ड के प्रबंधको का सबसे ज्यादा योगदान है |
* श्री लोहानी जी ने तो प्रशासन के साथ साथ अपने अधिकारों में आपस में पारिवारिक रिश्ते भी जोड़ दिये | एक नयी प्रथा थी यह | सभी सोचने लगे की ये क्या हो रहा है, कभी सोचा भी नहीं था की वरिष्ठ अधिकिरोयों के साथ जूनियर अधिकारी खाना भी खा सकते हैं | एक आश्चर्य था परन्तु एक दम सत्य |
* मैं वरिष्ठ अधिकारियों का विरिधी नहीं | बिना वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग के, बिना उनकी महनत के इन उचाईयों को छूना संभव भी नहीं होता | इनकी योजनायो, उनके रात दिन की महनत का काम ही रंग लाया है या सब |
* बल्कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की गलत अहम् के खिलाफ रहा हूँ सदा | आज भी हूँ | यह अहम् नहीं होता, ये आपसी राजनीति नहीं होती, ग्रुप बजी नहीं होती ३० साल पहले ही कुछ तस्वीर दूसरी ही होती | यह दुःख तो रहेगा सदा हमे |
* हमें अपना दुर्भाग्य महसूस हो रहा है बल्कि कमी महसूस हो रही है कि काश श्री लोहानी जी जैसे प्रबध संचालक पहले क्यों नहीं आये | इनको गुस्सा तो आता ही नहीं था | और मै समझता हूँ सबसे बड़ी शक्ति श्री लोहानी जी मैं थी वह थी "माफ़ करने की शक्ति" | ये ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी | आकास की ऊचाईयों तक पहुचाने वाले इस व्यक्ति के चहरे पर अहम् की एक झलक तक नहीं | मध्य प्रदेश पर्यटन निगम का हर सदस्य (चाहे वह अधिकारी हो या कर्मचारी हो, चाहे वह कहीं भी पदस्थ हो ) श्री लोहानी जी को अपना समझता है | आप जीयो हजारों साल हमारे अपने आदरणीय श्री लोहानी जी, शत शत प्रणाम आपको |

बदन सिंह चौहान - रिटायर्ड जनरल मैनेजर (मध्य प्रदेश प्रदेश टूरिस्म निगम ) - अभी गुडगाँव में - मोबाइल नंबर 8800933250

Wednesday, May 25, 2011

|| मध्य प्रदेश पर्यटन निगम द्वारा नहीं मनाया अपना जन्म दिवश - |मध्य प्रदेश पर्यटन दिवस (२४ मई)|

|| मध्य प्रदेश पर्यटन निगम द्वारा नहीं मनाया अपना जन्म दिवश - |मध्य प्रदेश पर्यटन दिवस (२४ मई)|
मध्य प्रदेश पर्यटन दिवस जो माननीय तत्कालीन प्रबंध संचालक श्री लोहानी जी द्वारा शुरू किया था - नहीं मनाया गया अबकी बार और आगे भी नहीं मनाने का निर्णय लिया गया है | मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के अधिकारियों ने ये जानकारी अपने माननीय नए चैयरमैन साहब और प्रभारी आदरणीय प्रबंध संचालक को दी | सुन कर बहुत दुःख हुआ |
(पुराने चैयरमैन साहब माननीय श्री ध्रुव नारायण सिंह जी ने पद छोड़ दिया है और प्रंबंध संचालक ट्रैनिंग अवकाश पर गए हुए है )

* अधिकारी लोग प्रभारी आदरणीय प्रबंध संचालक श्री पंकज राग को बताते है कि गर्मी के कारण ये आयोजन नहीं बनाने का निर्णय लिया गया है |
* और नए चैयरमैन साहब माननीय डॉ मोहन यादव साहेब ने कहा है कि मैंने तो अभी एक सप्ताह पहले ही प्रभार लिया है |
* (ये दोनों कथन मैंने गुडगाँव में बैठे एक अखबार में पढ़ा है - फेसबुक के माध्यम से)

अब तो बहुत से सवाल खड़े होते हैं |

* क्या ये उस प्रबंध संचालक आदरणीय श्री लोहानी जी का सीधा अपमान नहीं जिसने यह मध्य प्रदेश पर्यटन दिवस मनाने का निर्णय लिया और एक अच्छी प्रथा की शुरुआत कि थी ?
* क्या गर्मी के कारण का बहना ले कर आधिकारी लोग अपने प्रबंध संचालक और चैयरमैन को गुमराह नहीं कर रहे हैं ?
* गर्मी कि बात कहाँ से आ गयी ? आयोजन तो पांच सितारा होटल जहां-नुमा पैलस में किया जाता है ?
* क्या गर्मी के कारण अपने जन्म दिन को भूल जाएगा ?
* अधिकारीयों ने प्रभारी प्रबंध संचालक को जानकारी दी है कि गत वर्ष यह निर्णय हुआ था कि विश्व पर्यटन दिवश २७ सितम्बर के साथ ही मध्य पर्यटन दिवस भी मनाया जावे .... क्या यह मजाक नहीं लगता ? विश्व पर्यटन दिवश तो मनाना ही पडेगा क्योकि यह तो केंदीय सरकार का आदेश है ?
* क्या यह किसी ख़ास शक्तिशाली अधिकारी के सुझाव के बाद का निर्णय नहीं लगता है जो गत वर्ष रिटायर्मेंट हो गए और स्वयं को लाइफ टाइम का अवार्ड भी ले लिया गया ? और क्या वह नहीं चाहते थे कि आगे इस तरह का आयोजन चले ?
* क्या यह निर्णय उन सभी कर्मठ अधिकारी - कर्मचारी लोगो के लिए दुःख का विषय नहीं जो यह इन्तजार कर रहे थे कि इस दिन को उन्हे इनाम मिलेगा, मुख्य मंत्री जी ट्रोफी / प्रमाण पत्र देंगे ? उनकी भावनायों का क्या होगा ?
* क्या बड़े अधिकारी लोग नहीं चाहते कि दूसरे सभी कर्मठ अधिकारी - कर्मचारी लोगो भी अपने अच्छे कार्यो के लिए प्रोहत्साहन पावें और उनके काम कि कदर होवे ?
* क्या अधिकारी लोग इस तरह क़ी गलत जानकारी अपने नए चैयरमैन और प्रभारी प्रबंध संचालक को दे कर उनको गुमराह नहीं कर रहे हैं ?
* क्या इससे मध्य प्रदेश पर्यटन और मध्य प्रदेश राज्य को जो वर्तमान में / भविष्य मैं जो लाभ मिलता उससे वंचित नहीं होना पडा है ? क्या यह बहुत बड़ी हानि नहीं है ?
* क्या पर्यटन से जुडे लोगों को, पर्यटन से जुडी सस्थानों को मायूसी नहीं उठानी पड रही है जो यहाँ इस दिन आते थे और अपनी बात कहते थे और अपने योगदान के लिए सम्मान पाते थे ?

मैंने नए चैयरमैन साहेब से इस बाबत बात की की है | उन्होने भी माना है कि यह आयोजन होना तो चाहिए था | और कहा कि वह इस बाबत अधिकारियों से बात करेंगे |

बदन सिंह चौहान (रिटायर जनरल मेनेजर - मध्य प्रदेश पर्यटन निगम) मोबाइल नंबर: 8800933250

Tuesday, January 11, 2011

Madhya Pradesh - Beautiful.

सच में मध्य प्रदेस सुंदर है | मेने तो २८ साल नोकरी की है वहा`| अब तो सडक भी अच्छी हो गयी है | उस समय और आज में बहुत अंतर है | आने जाने के साधन अच्छे नहीं, टूटी फूटी सड़के, पर्यटन स्थलों की हालत अविकसित और कोई विशेष ध्यान नहीं था पर्यटन की तरफ | पर्यटन निगम की स्थापना हुई १९७८ में एक छोटी सी धन राशी एवं सीमित साधनों के साथ | और प्राम्भ हुआ विकास का काम | बहुत परिश्रम किया सभी ने, अधिकारी व कर्मचारी सभी लगे रहे अपने अपने काम में | हमारे निगम के प्रत्येक प्रबंध निदेशक जो भी आये सभी ने रात दिन कान किया | हम लोग आगे चलते गए और हमारा कारवां मजबूत बनता चला गया | सरकार ने विशेष ध्यान देना प्राम्भ कर दिया | बीच में कुछ समय ऐसा आया कि हमें लगने लगा कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है | निरंतर घाटा हो रहा था | स्थिति ऐसी हो कि सरकार ये सोचने को विवश हो गयी कि इस निगम का क्या करे ? और अंत में फैसला लिया गया कि पर्यटन निगम को बंद कर दिया जाए | इसकी कार्यवाही भी होने लगी | ये ऐसा समय था कि हर तरफ चिंता का विषय बन गया |
ऐसी विकट परिस्थिति में कई प्रबंध निदेशक आ कर चले गए और अपनी ओर से भरसक कोशिस की कि इस निगम को घाटे की स्थिति से उभार दिया जावे | परन्तु फिर भी बंद तो नहीं होने दिया निगम को |
अब आया २००४ का वर्ष, एक नए प्रबंध निदेशक आये ओर उनका नाम है श्री अश्वनी लुहानी | क्या सोच थी उनकी ! पहले वर्ष में ही दिशा बदल दी | तेज रफतार से विकाश होने लगा | नए नए प्रयोग होने लगे | काम करने वाला हर कर्मचारी में नया जोश भर गया | ये प्रबंध निदेशक अपने से लगने लगे | सब कुछ भिन्न था | ओर पहले ही वर्ष में निगम लाभ में आ गया | श्री अश्वनी लुहानी जी एक वर्ष के लिए कुछ कारणों से निगम से बहार चले थे | ऐसा लगा कि कोई अपना बिछड़ गया है | एक वर्ष बाद् २००६ में फिर निगम आये, हम लोगो के प्यार ने मजबूर कर दिया उनको आने के लिए | काम कि रफ़्तार तो हम में बनी हुई थी पहले वाली | होने लग्गा चारो तरफ विकास ही विकास | सादे चार साल ज्यादा रहे दुबारा | विकास की सूचि बहुत लम्बी है यहाँ पर सब कुछ लिखना मुस्किल है | हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिदुस्तान का दिल दिखा दिया लुहानी जी ने | पर्यटन की परिभाषा ही बदल कर रख दी | हर विकास को पर्यटन से जोड़ दिया | विकास, विकास, विकास ओर सिर्फ विकास | एक स्वर्ण युग दे कर श्री अश्वनी लुहानी अपने पैत्रिक विभाग रेलवे में दिल्ली चले गए दिसम्बर २०१० में | हम ओर मध्य प्रदेस ही नहीं बल्कि पूरा पर्यटन संसार नहीं भूलेगा आपको लुहानी जी | कई दर्जन अवार्ड दिलाये हमें और स्वयं अनेको अवार्ड से सुसोभित है आप | सतसत प्रणाम आदरणीय आपको | सादर नमन |
अब आये नए पर्बंध निदेशक श्री हरि रंजन राव जी फरवरी २०१० में | बहुत ही मुस्कराहट वाले व्यक्ति, पहली मुलाकात में दिल जीत लिया सबका | पहेले वाली रफ़्तार को पकड़ा, वो ही नीतिया अपनाई ओर कर्मचारियों को प्यार देना बराबर रखा | बाकि जो काम बचा था उसे आगे बढाया | श्री हरि रंजन राव जी भी अपने से लगते है जब मिलते है | लुहानी जी की कमी पूरी करते नजर आ रहे है | विकास की रफ़्तार और तेज हो गयी है | मेरा नमस्कार आपको माननीय |

(बदन सिंह चौहान - रिटायर्ड महा प्रबंधक "मध्य प्रदेस पर्यटन निगम" {मोबाइल नंबर 07827465334)