Saturday, September 29, 2018

स्वच्छ भारत अभियान

स्वच्छ भारत अभियान और और गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम
इस शीर्षक पर गांधी गांधी शांति अभियान के अध्यक्ष प्रोफेसर एन राधाकृष्णन ने अपने लेख में स्वच्छता के बारे में इसको एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को मानते हुए इसको अग्रसर बढ़ाने में जोर दिया है।
यह सामान्यतय विश्वास किया जाता है कि गांधीजी के दर्शन और दृष्टिकोण की ताकत, जीवन शक्ति और प्रासंगिकता इस आधार पर मापी जाती है जो कि उसका दर्शन इस प्रकार स्पष्ट किया गया है कि वह आध्यात्मिकता को शक्ति देता है और जो सामाजिक परिवर्तन की ओर ले जाता है।
अरिस्टोल- प्लेटो का एक नया विचार, श्री रामकृष्ण- विवेकानंद का आध्यात्मिक बंधुत्व, कार्ल मार्क्स -लेनिन की राजनीतिक एकजुटता आदि ...ये बहुत ही साहसिक और उच्च कोटि के उदाहरण है जिसने समाज में परिवर्तन लाने का कार्य किया । भारत में भूदान आंदोलन के माध्यम से विनोबा भावे के प्रयत्न गांधीजी के क्रांतिकारी अभियान को बढ़ाने में बहुत महत्वपूर्ण है चाहे वह थोड़े समय के लिए ही हो । आज यह माना जाता है कि गांधी जी का दर्शन अब एक शैक्षणिक संस्थाओं में एक विषय के रूप में ही रह गया है । और एक विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में उनकी स्तुति योग्य रह गई है परंतु दैनिक जीवन में उनका अनुसरण करना कठिन है।
गांधीजी के 150 वर्ष की जन्म शताब्दी ऐसी होनी चाहिए कि हम अपने अंदर गांधी जी को खोजें और समझे कि उनकी हमारे राष्ट्र को क्या विरासत दे गए हैं।
स्वच्छ भारत अभियान गांधीजी का एक स्वस्थ राष्ट्र के रूप में देखना था । हमारे देश में समय-समय पर इस अति महत्वपूर्ण विषय को अभियान के रूप में उठाया भी गया है । अब यह राष्ट्र के लिए जन आंदोलन के रूप में पूर्ण अभियान का रूप ले चुका है जो निचले स्तर से प्रारंभ करके भारत को स्वच्छ और स्वस्थ भारत बनाना है । हम भारतीयों ने गांधीजी के इस सपने को साकार करने के लिए शपथ भी ले चुके हैं । बापू गांधी जी के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम भारत को एक स्वच्छ भारत बनाए और इसके सफल बनाने हेतु समाज के हर वर्ग ने आगे बढ़कर निष्ठा से इस अभियान को अपने हाथों में लेकर बहुत ही अद्भुत कार्य करने का संकल्प लिया है।
गांधी जी ने कहा था मेरा जीवन ही मेरा संदेश है ।।

गांधीजी के विचार जैसे सर्व धर्म समानता, खादी का उपयोग, नशा मुक्ति, ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा, शिक्षा की अनिवार्यता, नारी का 'सम्मान, न्याय, स्वतंत्रता', स्वस्थ एवं स्वच्छ  भारत, शिक्षित भारत, राष्ट्रीय भाषाओं को महत्व देना, आर्थिक समानता का विचार, ग्रामीण विकास, श्रमिकों का विकास, आदिवासियों का विकास, कुष्ठ रोग से मुक्ति और युवकों व छात्रों को जिम्मेदारी  लेना .. ये मात्र दर्शन ही नहीं अपितु जीवन की एवम राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने की मूल आवश्यकताएँ है।

आओ हम स्वच्छ भारत बनाएं।

जय हिंद।

Monday, September 10, 2018

मेरा गाँव अल्लिका

मेरे गांव का नाम अल्लिका है। जिला पलवल से पश्चिम में 10 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यहां लगभग 700 घर हैं और कुल आबादी लगभग 7000 है। जाट जाति की बहुलता है मेरे गाँव में। हरिजन, बाल्मीकि, नाई, कुम्हार,  ब्राह्मण भी रहते हैं, कई घर धोबियों के भी हैं। मेरा गाँव लगभग 500 वर्ष पहले यह गांव बसा। बसावट से अब तक 19वीं और 20 पीढ़ी भी चल रही है।
आज हमारे इस गांव में शिक्षा शत प्रीति सत चल रही है। अभी पिछले दिनों सर्वे हुआ था उसके अनुसार 0 से 14 वर्ष के बच्चों का पढ़ाई के आंकड़े इकट्ठे किये गये, जिसके अनुसार पाया गया कि कुल 887 बच्चों में से जो भी स्कूल जाने योग्य है वे बच्चे सभी स्कूल जा रहे हैं। यह जान कर बहुत अच्छा लगता है। गांव में दो स्कूल हैं, एक हायर सेकेंडरी 12वीं तक और दूसरा प्राइमरी स्कूल है, पांचवीं तक। जब हमारा देश आजाद हुआ था सन 1947 में तब एक स्कूल था प्राइमरी, फिर मिडिल बना। और बाद में हाई स्कूल और फिर हायर सेकेंडरी स्कूल बना। और प्राइमरी शाखा अलग कर दी गई। पहले, आजादी से पहले यहाँ प्री प्राइमरी 1 से 3 तक का स्कूल था। बच्चे लोग आगे पढ़ने के लिए गांव धतीर जाते थे, जहां 4थी एवं 5वीं की कक्षाएं लगती थी। उसके बाद गांव पृथला के स्कूल में दाखिला लेना पड़ता था। धतीर 4 किलो मीटर और पृथला 9 किलो मीटर पड़ता है। बहुत कम ही बच्चे पढ़ने के लिए जाते थे। उनके मां बाप अपने बच्चों को बहुत ही कम भेजते थे।
जाटों के बहुल इस गांव में कृषि मुख्य व्यवसाय है। पिछड़ी जाति के लोगों के पास कृषि भूमि नहीं है। इस लिए वे लोग मजदूरी करते आ रहे हैं। आज के समय में जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया, पढ़ाई आगे बढ़ती गई और लोग, चाहे वे उच्च वर्ग के हों या पिछड़ी जाति के, शहर में जा कर योग्यता अनुसार नौकरी करने लगे हैं। आज हमारे गांव के लोगों में से जज भी हुएं हैं, सरकारी  बड़े अधिकारी हुएं हैं, प्रोफेसर, डॉक्टर और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में देश विदेशों में नौकरी करते हुए। ये सब हमारे लोगों की पढ़ाई के बारे में आगे बढ़ने की पृवत्ति का ही फल है। गर्व होता है ये सब देख कर और सुन कर।
जहां एक तरफ पढ़ाई की ओर इतना अग्रसर है मेरा यह गांव, दूसरी तरफ दिल को चोट पहुचाने वाली दुःखद बाते भी हैं। लोगों में शराब की, दूसरे प्रकार के नशे की आदत भी बहुत पाई जाती है। शराब के कारण बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं और मर रहे हैं। नए नए लड़के मर रहे हैं। और हमेशा इन लोगों के घरों में झगड़ा होता है। इसका कारण मां बाप को भी जाता है क्योंकि वे भी इसी लत से घिरे हुए थे। उनसे ही देख कर आदत में ले लिया उनके बच्चों ने। और आत्म हत्या, हत्या भी तो हो रहीं हैं।
राजनीति के स्तर की गिरावट के कारण गांव में गुटबाजी बन गई। एक दूसरे को खत्म करने पर तुले हो जाते हैं। कोशिश करते हैं कि विरोधी को पुलिस में दे दिया जाए, फसा दिया जाए और यहां तक उसकी हत्या कर दी जाए।
परिवार बढ़ने से जमीन कम हो गई है अपने अपने हिस्से की। संयुक्त परिवार नहीँ रहे। पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने के लिए आज की पीढ़ी उठाने के लिए तैयार नहीं है। चाहे बेटा हो या बहु आए घर में, घर की व मां बाप की जिम्मेदारी कोई नही उठाना चाहता। ऐसा अधिकांश हो रहा है।
1958 में बाढ़ आई:
एक समय मैंने ऐसा भी देखा है जब बाढ़ आ गई थी मेरे गांव में सन 1958 में। मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ता था । बहुत बड़ी बाढ़ आई थी, पूरा इलाका डूब गया था, मेरा गांव पूरा डूब गया था । गांव में ऊंची वाली जगह ही थी अन्यथा आसपास का पूरा पूरा इलाका  पानी से भरा हुआ था। यह हालत थी कि जो लोग ऊपर वाले घरों में रह रहे थे उनको बाहर जाने के लिए उनको सौच जाने के लिए भी जगह नहीं । उस समय का नजारा मुझे आज ही याद आ रहा है । ऐसी हालत थी उसको देख कर आज भी हम घबरा जाते हैं । लोग मेरे गांव के लोग अपने मवेशियों को लेकर अपने-अपने रिश्तेदारियों में चले गए थे और वही 3, 4 महीने रहे और तब तक नहीं आए जब तक बाढ़ का पानी नीचे नहीं उतर गया हो । हम लोग और चाचा अमीलाल के पिताजी सब मवेशियों को लेकर पृथला गाँव चले गए थे । उस समय मेरे बड़े भाई भीम सिंह की शादी हुई थी । उस समय हम दोनों रिश्तेदारियों में बहुत बड़ा प्यार था । उन्होंने कहा था आप मुसीबत के समय हमारे गांव आइए और हमारे घर पर ही रहिए और हम वहां चले गए लगभग 3, 4 महीने वहां पर रहे । मुझे याद आ रहा है वह बचपन का समय कि हम वहां रहते थे ।

गांव की संस्कृति:
इस गांव के लोग लगभग 500 वर्ष पूर्व राजस्थान से आए थे और वहां की संस्कृति भी अपने साथ लाए थे। मैंने अपने ही बचपन के समय में देखा है । यहां के लोगों का रहना सहना पहनना राजस्थान की संस्कृति से मिलता था । लोगों का पहनावा राजस्थान के पहनावे जैसा था। सिर पर पगड़ी पहनते थे कमर के नीचे आधी धोती पहनते थे और शरीर को ढकने के लिए कुर्ती पहनते थे। जिसमें घुंडी दार कपड़े का ही बना हुआ गांठ दार बटन होता था । ऐसा भी पाया जाता था कि कुछ लोग कानों में सोने का आभूषण पहनते थे। जिसको पुरुष लोग भी पहनते थे इसको मुरकी बोलते थे। कान सबके छिदे रहते थे। और महिलाओं का पहनावा इस प्रकार था की जैसे अभी भी दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में राजस्थान में पहनावा पाया जाता है। वक्ष को ढकने के लिए अंगिया पहनते थे। और कमर से पैरों तक आने के लिए घाघरा पहनते थे। बाकी शरीर को ढकने के लिए कुछ भी नहीं पहनते थे। एक ओढ़ना होता था जो सिर पर ढका जाता था और उसी से ही घागरे में अटका कर पूरे शरीर को ढक लिया जाता था । आभूषण के तौर पर पैरों में चांदी के आभूषण होते थे जिनमें करूला, पाज़ेब आदि कहलाते थे । सिर पर बाल में अटकाते  हुए बोरला पहनती थी । नाक में नथ या बूरा पहनती थी, वह छोटे बड़े आकार की हुआ करती थी । गले में सोने की हसली, हार, मोहर, आदि पहनती थी । देखते देखते सब बदल गया । पुराने गहने बदल गए । औरतों का पहनावा बदल गया । पुरुषों का पहनावा बदल गया । 50 के दशक में मैंने जो देखा था वह मैंने ऊपर लिखा है और यह 70 के दशक तक चलता गया और उसके बाद इस तरह का पहनावे में और आभूषणों में बदलाव आता चला गया। गांव में लोग शिक्षित होने लगे। पहनावे में भी बदलाव आने लगा। 80 के दशक के बाद बदलाव तेजी से आने लगा। नए-नए जो लड़के आ रहे थे और मैं पेंट कमीज और कच्छा पहनते थे । पुरुष आभूषण के नाम का कुछ नहीं पहनते थे। वह जो कान में मुरकी पहनते थे अब नही पहनते थे। और औरतों में पुराने समय के जो मैंने देखा था 50 और 60 के दशक में जो पहनावा था वह तेजी से बदलने लगा। अंगिया का पहनावा और घागरा का पहनावा 70 के दशक के बाद खत्म सही हो गया था । घागरे की जगह पेटीकोट ने ले ली और धीरे-धीरे आज स्थिति यह है कि यह घागरा पेटीकोट आज खत्म हो गया । अंगिया तो देखने को नहीं मिलती है । अंगिया का स्थान 70 दशक में ही कमीज ने ले ली। 1947 के बाद में भारत के विभाजन के बाद सभी लोग जब भारत आए, तो यह अपना छोटा छोटा व्यापार सड़कों पर कपड़ा बिछाकर करने लगे और गांव में फेरी लगाकर रोज जरूरत की चीजें बेचने लगे, उनमें कमीज और कच्छे भी बेचा करते थे। कि लोगों ने उसे कमीज और कच्छे लेने शुरू किए। पुरुषों ने और महिलाओं ने भी कमीज और कच्छों का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया । बहुत हद तक हमारे गांव में और सभी इलाकों में इन पंजाबी शरणार्थियों के फेरी वाले व्यापारियों ने गांवों के पहनावे पर बहुत असर डाला। और वह राजस्थान का जो पहनावा था वह प्राय समाप्ति हो गया । आज हम कह सकते हैं शत प्रतिशत महिलाएं अब पंजाबी सूट सलवार ही पहनती है। पुराने जो महिलाएं हैं अपवाद के रूप में देखी जाएगी कि पेटीकोट और कमीज ही पहनती और इसी प्रकार पुरुषों में अभी है धोती पहने हैं, आधी धोती होती है। नीचे कक्षा जरूर पहनेंगे, पहले कक्षा नहीं पहनते थे और ऊपर कमीज कुर्ता कुर्ता पहनते हैं । इस प्रकार गांवों का पहनावा पहले क्या था और अब क्या है, यह मैंने अपने जीवन के इन 70 साल में देखा है । बड़ा तेजी से बदलाव आया।
गाँव में औरतों का पहनावा
जब दुल्हन पहली बार ससुराल शादी में और गोने में जाती थी तो तीहर, जिनमें घागरा, कमीज और ओढ़ना होता था, उसको अंगिया से बांधते थे। पहले घाघरे अवश्य देते थे। फिर या भी बदल गया, घाघरे का चलन खत्म हो गया।
आभूषणों में हसली, मोहर, गुलिबन्द, जौ माला, कानो की बूचनी, नथनी, बंदनी, घुंगट, चांदी का चुटीला, बोरला, हथफूल, हाथ के करूला, गजरे हाथों के, छन हाथों के, डार हाथों की, दुआ हाथों के, पछेरी हाथों की, पावों के करूला, पायजेब, छैल करे, नेवरी, गठिया, पाती, चांदी की अंगिया, तागड़ी, नाडा, कठला, आदि पहनी थीं नई दुल्हन। ये सब 1980 के दसक तक चलन में रहा। फिर धीरे धीरे खत्म हो गया।
पहले मिसानों के हर परिवार के पास में दो घर हुआ करते थे। एक घर हुआ करता था जिसमें महिला और बच्चे रहते थे। दूसरा एक बैठक हुआ करती थी जिसको नौहरा कहते थे । और यूपी में यमुनापार इलाके में उसको घेर बोलते हैं । परन्तु  दो मकान जरूर हुआ करते थे ।उस बैठक में  गाय भैंस व बैल फालतू पशु रहा करते थे। और पुरुषों के लिए बैठक हुआ करती थी । वहां खाट बिछाई हुआ करती थी । और आवश्यक रूप से हुक्का रखा हुआ करता था ।  हुक्के पर आसपास के लोग सिर्फ हुक्का पीने के लिए वहां आया करते थे । सामाजिक सद्भावना बना कर रखते थे। यह पूरे हरियाणा में और जाट बहुल इलाके में सभी जगह चाहे दूरस्थ हरियाणा हो या यमुना पार का का क्षेत्र, यह जाट, गुर्जर, यादव निवासित क्षेत्र हुक्का पर बैठे हुए लोग आपस में भाईचारे की बात करते थे । अपने दुख सुख की बात करते थे। कोई समस्या हो उस को निपटाने की बात करते थे। तब यह हुक्का बैठक में रखा हुआ करता था । दूसरी तरफ पाया गया कि जब किसान अपने बैलों को लेकर सुबह सुबह खेत जोतने के लिए घर से बाहर निकलता था तो अपने साथ एक छोटा सा हुक्का भी ले जाया करता था। उसको कली बोलते थे । और खेत में काम करते करते थक जाने के बाद जब वह थोड़ा आराम करते थे तो वहीं पर ही वह अपने इस छोटे से हुक्के को पीते थे। हुक्के में एक चिलम रहती है । उस चिलम के अंदर तंबाकू रखकर आंच के छोटे-छोटे टुकड़े रखते थे। गांव में जाट जाति की बहुलता है। यह लोग किसान इनके पास में जमीन है और यह खेती करते हैं । वर्ष भर में दो बार फसल बोई जाती है । एक खरीब की और दूसरी रवि की फसल। खरीफ की फसल मानसून या बरसात काल में बोई जाती है और रवि की फसल नवंबर में बोई जाती है जो मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है । ज्यादातर खरीब की फसल में ज्वार बाजरा बोया जाता था। कुछ लोग मक्का और कुछ दाल भी बयां करते थे और कपास भी बोलते थे। रवि की फसल में उस समय मैंने देखा है 50 के दशक में पानी के साधन नहीं थे, चना बोते थे, जौ बोते थे, गेहूं बहुत कम हुआ करता था । गेहूं और चना मिलाकर जिसको गोचनी बोलते थे, और जौ व चना मिला कर जिसे बेझर बोलते थे खेतों में बोया करते थे । इस तरह की खेती हुआ करती थी । पानी के साधन न होने के कारण किसानों की आधी से ज्यादा जमीन बोई नहीं जा सकती थी। खेती का उत्पादन ज्यादा नहीं हुआ करता था । लोग निर्धनता में जिया करते थे।

स्वास्थ सुरक्षा के नाम पर यहां पर कोई सुविधा नहीं थी। मुझे याद है अभी भी यदि कोई खास बीमारी होती थी तो पलवल यहां से 10 किलोमीटर जाते थे । पैदल जाया करते थे या फिर घोड़ा तांगा चलता था जो सुबह जाता था शाम को आता था उसमें जाया करते थे । पलवल में सरकारी अस्पताल था और मिशन हॉस्पिटल भी था और क्रिश्चियन हॉस्पिटल भी था । वहां अपना इलाज किया कराया करते थे । प्राइवेट डॉक्टर भी बैठा करते थे। मुझे भी याद है उस जमाने में मूलचंद डॉक्टर हुआ करते थे। और सरकारी अस्पताल में भी था, उसका भी मुझे याद है। आज मेरे इस गाँव में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र है अर्थात एक छोटा सा अस्पताल है यहां के चिकित्सा अधिकारी प्रभारी डॉ संजय सिंह बहुत मेहनत करते हैं। यहां का अनुशासन बहुत अच्छा है । साफ सुथरा है । आज के दिनांक में बहुत सुविधा है मरीजों के लिए । 6 बिस्तर मरोजों को प्रवेश देने के लिए। उसने आज मुझे बताया यहां महिलाओं की डिलीवरी भी होती है । पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर उपलब्ध है, डेंटिस्ट है, हर शुक्रवार को आंखों का डॉक्टर आता है और महिला डॉक्टर तो प्रतिदिन यहां बैठती हैं । डॉक्टर संजय ने बताया कि यहां पर 29 गांवों का केंद्र है । आज मैंने देखा यहां गर्भवती महिलाएं बहुत संख्या में इकट्ठी हुईं बैठी हैं । मैंने डॉक्टर संजय से पूछा कि यह कौन लोग हैं जो आज की डेट भीड़ में इकट्ठी हुई है। उसने बताया कि आज इनका एक विशेष रूप से चेकअप का दिन रखा गया है । डॉक्टर महिला ने अभी गर्भवती महिलाओं का चेकअप करना है और यही यही इन को आगे निर्देश देना है कि किन-किन बातों का ख्याल रखना है । डॉक्टर साहब ने बताया कि आज के दिन हमने बाहर से कांटेक्ट पर लैब टेक्नीशियन भी बुलाए हुए हैं जो इन गर्भवती महिलाओं का आवश्यक रूप से खून और अन्य निरीक्षण भी करेंगे। मैंने अस्पताल में एक ₹2,00000/- के चेक का लैमिनेटेड पोस्टर लगा हुआ देखा। मैंने उसके बारे में पूछा तो डॉक्टर संजय ने बताया कि यह हमें अच्छे कार्यों के लिए चीफ मिनिस्टर की ओर से ₹2,00,000/- का चेक मिला है और उसको हमने आवश्यक रूप से सुविधाएं बढ़ाने के लिए हॉस्पिटल के कार्य में ही खर्च किया है । पर्याप्त मात्रा में दवाइयां मिलती हैं,  स्टाफ नर्स है, इमरजेंसी के समय 24 घंटे डिलीवरी का कार्य किया जाता है। इस प्रकार की सुविधाओं को देखकर मुझे आज बहुत अच्छा लगा कि मेरे गांव में इतना साफ सुथरा और इतना अच्छा हॉस्पिटल है । इतने अच्छे डॉक्टर हैं और बहुत ही अच्छी तरह से अनुशासन को कायम रखते हुए अस्पताल का संचालन किया जा रहा है । हमें गर्व है ऐसी इकाई पर।

शिक्षा के कार्य में पहले यहां पर 1928 से पहले कोई भी स्कूल नहीं था । फिर एक प्राइमरी स्कूल आया जिसमें 1 से 3 कक्षा तक पढ़ाई हुआ करती थी। उसके बाद हमें बच्चों को पास के गांव जो यहां से 4 किलोमीटर दूर होगा कम से कम वह भेजना पड़ता था । उस गांव का नाम है धतीर । वहां सिर्फ दो क्लास लगती थी चौथी और पांचवी क्लास । उसके बाद छठी, सातवीं व आठवीं के लिए गांव पृथला चला जाना पड़ता था जो यहां से 12 किलोमीटर दूर स्थित है । पहले शिक्षा पाने के लिए कोई सुविधा नहीं थी और आज आजादी के 71 साल के बाद में मेरे इस गांव में मुझे इस बताने में खुशी होती है कि यहां पर कि एक हायर सेकेंडरी स्कूल है जिसमें 12वीं तक शिक्षा दी जाती है और एक प्राइमरी स्कूल है जहां एक से लेकर पांचवी तक शिक्षा दी जाती है । दोनों स्कूलों में अच्छा स्टाफ है। प्राइमरी स्कूल में मेरी बिटिया मधु चौहान मेरी बड़ी बिटिया है, यहां पर स्कूल की प्रभारी है 2016 से। वह इस स्कूल में पदस्थ है और प्रभारी के रूप में कार्य कर रही है। हायर सेकेंडरी स्कूल में बहुत अच्छा स्टाफ है। वहां भी बहुत कार्य किया है, बहुत अच्छी बिल्डिंग है बहुत बड़ा ग्राउंड है और अध्यापक लोग बहुत मेहनत करते हैं । परन्तु सरकारी होने के कारण स्कूल के भवन का रखरखाव अच्छा नहीं है और अंदर का जो कार्य है उसमें भी बहुत सुधार की बहुत जरूरत है । लगभग 10- 15 सालों से दोनों स्कूलों में,प्राइमरी स्कूलों में स्कूल में और हर सेकेंडरी स्कूल में भी, पुराना फर्नीचर टूटा हुआ पढ़ा हुआ है, पहले तो बाहर आंगन में ही पड़ा था अब उसको उठाकर छत पर रख दिया है, उसको राइट ऑफ करने की जरूरत है । मगर शिक्षा विभाग इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है । मैंने जो लिखा था 14 में शिक्षा विभाग को कि इस पुराने फर्नीचर को नीलाम कर दिया जाए या नष्ट कर दिया जाए परन्तु मेरे इस पत्र पर किसी ने ध्यान नहीं किया । आज शिक्षा की स्थिति बहुत अच्छी हो गई है । जहां पहले आजादी के बाद कुछ ही लोग स्कूल जाते थे आज 100% बच्चे स्कूल जा रहे हैं। यह गर्व की बात है । मैंने अभी वह रिपोर्ट देखी है जिसमें सरकार ने सर्वे कराया था कि 14 साल तक के बच्चों की स्थिति क्या है कि कितने स्कूल जाते हैं और कितने स्कूल नहीं जाते हैं । रिपोर्ट में मैंने पाया कि 887 बच्चों में से जितने भी बच्चे स्कूल जाने लायक हैं वे सभी बच्चे स्कूल जाते हैं अर्थात शत-प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे हैं । यह भी हमारे लिए बहुत ही बड़ी उपलब्धि है। राष्ट्रीय स्तर पर मेरे देश में 1947 में आजादी के समय आजादी के मिलने से पहले शिक्षित वर्ग का प्रतिशत मात्र 17% था और आज वह बढ़कर 74 प्रतिशत हो गया है । मेरे इस गाँव के लोगों में से आज जज भी हुए, अनेकों वकील है, अनेकों अच्छे-अच्छे पदों पर रहे हैं, बहुत बच्चे मेरे गांव से विदेशों में नौकरी करते हैं, डॉक्टर है। बहुत अच्छे बहुत अच्छा लगता है यह सब देख कर । और इंजीनियर तो मेरे गांव में बहुत है। कुछ लोग अपना व्यवसाय करते हैं । हमारे गांव के लोगों में से ही किसी ने एक हॉस्पिटल भी बना लिया है। बहुत लोग प्रॉपर्टी डीलर का काम करते हैं। शहरों में जाकर बस गए । हमारे देश के बड़े शहरों में ही नहीं विदेशों में भी जाकर बस गए, अमेरिका में रहते हैं, इंग्लैंड में रहते और चीन में भी रहते हैं। बड़ा अच्छा लगता है जब हमारे बच्चे विदेश पढ़ने के लिए जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य है।

Wednesday, September 5, 2018

लोगों से काम करना बड़ा कठिन होता है

लोगों से काम कराना बहुत कठिन होता है

पिछले महीने अगस्त में मेरी बेटी एकता ने, जो गुजरात के गांधीनगर मैं रहती है, मुझसे फोन किया कि उसको हांगकांग में नौकरी के लिए आवेदन करना है उसके लिए यूनिवर्सिटी से जहां जहां से भी उसने पढ़ाई की है वहां से उसके सर्टिफिकेट (जिसको ट्रांसक्रिप्ट कहते हैं) चाहिए ताकि वह एंबेसी में संबंधित को दिखाए जा सके। एकता ने ग्वालियर से BPED और MPED  किया है, जीवाजी यूनिवर्सिटी से और जबलपुर से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से BSC किया है और भोपाल से M.A. किया है इन तीनों विश्वविद्यालयों से उसके ट्रांसक्रिप्ट चाहिए। अब इतना आसान काम नहीं है। वैसे भी इस काम में देर लगती है । फिर भी मैंने कोशिश की कि मैं अपने संपर्क वालों से बात करूँ, वहां बैठे हुए लोगों से कहा जाए कि ये सर्टिफिकेट उपलब्ध करा देवें. भोपाल में मैंने होडल सिंह से कहा जो भोपाल यूनिवर्सिटी में कार्यरत है, वह जाट है, मेरा उससे संपर्क रहा है। उसने कहा मैं करा दूंगा। जबलपुर में मैंने मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के होटल में कलचुरी होटल में कार्यरत अपने संपर्क वाले व्यक्ति श्रीमती डॉली मैडम से कहा। उसने बड़े शौक से ही, बड़े रूचि लेकर कहा कि "सर मैं इस काम को जरूर करा दूंगी और उसने 4- 6 दिन में वह काम करा दिया। इसमें हमें कोई परेशानी नहीं है और बहुत ही रुचि ले कर उसने काम करा दिया। उसमें जितना खर्चा लगा मैंने उनसे उसका अकाउंट नंबर लिया और एकता को भेज दिया, एकता ने उसके पैसे भेज दिए कुल ₹1000 से भी कम खर्चा आया, उसको ₹1000 पूरा भेज दिया गया। उसका बहुत ही एहसान मानता हूं और वह इस काम को करने में बिल्कुल भी परेशान नहीं हुई। अब बात करते हैं होडल सिंह की। उसने पहले तो हां कर दी, फिर ध्यान नहीं दिया तो मैंने बार-बार कहा कि मैं दो-चार दिन में करा दूंगा मैं 'आज जाट सभा के चुनाव में लग रहा हूं, आज वह काम है, आज यह काम इस तरह उसने कई एक सप्ताह से ज्यादा इसी में काम में लगा दिए। मैंने सोचा काम जल्दी हो जाएगा तो मैबे सोचा कि किसी और व्यक्ति को बोलता हूं ताकि वह होडल सिंह से मिल ले। मैंने समर पाल चौहान से कहा।समर पाल चौहान मेरे संपर्क वाले हैं, वह भी मेरे साथ में मध्य प्रदेश टूरिज्म में काम करते थे। उसने होडल सिंह को फोन किया और कहा कि कितने पैसे जमा करने हैं मैं आ जाता हूं। उसने बताया कि ₹1500 लगेंगे। इधर एकता ने अपने साथ पढ़े हुए एक व्यक्ति को कहा जिसका नाम अमित रिछारिया है उसको भी कह रखा था। उसको होडल सिंह का नंबर दे दिया और वह होडल सिंह से संपर्क कर ले ताकि काम जल्दी हो जाए और कहा कि पैसे भर देना। अमित ने भी होडल सिंह से बात की। होटल सिंह नाराज हो गया की दो-दो लोगों को भी बोल दिया है और वह कह रहे हैं कि कितने पैसे भेजे हैं, कब आ जाएं, तो उसको लगा कि मैं उसके ऊपर विश्वास नहीं कर रहा हूं और लोगों को भी भेज रहे हैं, तो होडल ने मेरे को फोन किया और यह सब बातें बताई कि उसे अच्छा नहीं लगा कि मैंने अन्य दो लोगों को भी बोल दिया है, वे पूछ रहे हैं कि कितने पैसे लगेंगे, ऐसा समझा जा रहा है कि मैं पैसा ले कर काम करता हूँ। बड़ी मुश्किल से मैंने उसको मनाया और अपनी बात कही कि मैंने जल्दी करने के लिए इन लोगों से कह दिया था। तो बड़ी मुश्किल से उसको मना लिया। एक बार तो ऐसा लगा कि अब काम नहीं होगा। अंततः उसने कहा ठीक है मैं करा देता हूँ।उसने काम करा दिया मगर बहुत समय लिया। अब बात आती है ग्वालियर के काम की। ग्वालियर में सबसे पहले एकता ने बात की थी यूनिवर्सिटी में फिजिकल डिपार्टमेंट में प्रोफेसर डॉ केसर सिंह जी गुर्जर से। उसने कहा मैं करा देता हूँ। इसमें कोई समस्या नहीं है। एकता ने उसको व्हाट्सएप्प पर सारे डॉक्यूमेंट बीपीएड व एमपीएड के भेज दिए। उसके बाद एकता ने बार बार फोन किया तो डॉक्टर केशव सिंह जी ने फोन ही नहीं उठाया। इसके बाद मैंने एकता से पूछा कि डॉक्टर राजेंद्र सिंह गुर्जर से बात की जाए। एकता तो नहीं चाह रही थी कि उससे बात की जाए, पर मैंने कहा मैं उसको WhatsApp पर मैसेज देता हूँ, एकता ने कहा ठीक है। मैंने उनको मैसेज दिया, उसने मेरे को जवाब दिया कि कोई यहां आ जाए और यह पैसे भर दे तो यहां से काम करा कर ले जाए। एक बार तो उसने यह कह दिया था कि यह ऑनलाइन होता है जबकि मैंने चेक किया यह ऑनलाइन नहीं होता है । मैंने उसको यह बता दिया। तो उसका अर्थ मेरी समझ में आ गया कि वह नहीं कराएगा, जबकि उसके पास में बहुत स्टाफ है, छात्र हैं किसी को भी भेजकर यह काम करा सकता था, मगर नहीं कराया। इसके बाद मैंने एकता को बताया कि इस तरह का जवाब राजेंद्र सिंह ने दे दिया है। एकता ने कहा कि उसे डॉक्टर राजेन्द्र सिंह से ऐसी ही उम्मीद थी। फिर एकता ने अपने एक साथी श्री मोगे को बोला कि वह केशव सिंह से संपर्क करके यह काम करा ले। वह 2 दिन लगातार जाकर केशव सिंह क्या ऑफिस में जाकर बैठे रहे पर वह मिले ही नहीं। और इस प्रकार फिर कोई भी उम्मीद नहीं। फिर मैंने विश्वविद्यालय में अपने एक जानने वाले मित्र तेवतिया से बात की जो वहां असिस्टेंट रजिस्ट्रार है। उसने कहा आप एक दिन आ जाइए और हाथो हाथ लेकर चले जाइए। मैंने उनसे कहा मैं किसी को भेज देता हूं यहीं ग्वालियर से ही, उसने कहा ठीक है फिर जो मैंने एकता को कहा कि आप किसी को भेज दो। जो मोगे था वह तो बाहर गया हुआ था, एकता ने फिर एक दूसरे साथी श्री पांडे को कहा जो एकता का जूनियर था, उसने कहा मैं करा दूंगा। उसने जाकर तेवतिया से संपर्क किया। चालान बनवा कर पैसे भी भर दिए। विश्वविद्यालय से कुछ डॉक्यूमेंट लिए जो कि बाहर से टाइप कराना था उसे टाइप करा दिए।अब टाइप करा कर उसको विश्वविद्यालय जाना था, फो तीन दिन वहां जाकर लौट आया, फिर उसको बाहर जाना था और इस प्रकार देर हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी वह स्कूल में नौकरी करता था और स्कूल बंद होने के बाद 3:00 बजे के बाद ही विश्वविद्यालय जा सकता था। फिर मैंने किसी संपर्क वालों से कहा ग्वालियर में तानसेन होटल के मैनेजर श्री दंडोतिया से कहा कि मेरा काम करा दीजिए, उसने ना तो ना किया परंतु हां भी नहीं किया। उसने कोई ना कोई बहाना बनाया और चुप हो गया, उसने कोई रुचि नहीं ली। इसके बाद में डॉली मैडम ने जबलपुर से ग्वालियर फोन किया अंजू त्यागी को। उसने कहा मैं यह काम करा देती हूं तो त्यागी ने क्षेत्रीय कार्यालय में पदस्थ क्लर्क श्री इरसाद खान को बोला कि आप चौहान साहब का काम करा दीजिए। इसरार खान ने मुझे फोन किया, मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने उसको सब बता दिया कि आप पांडे जी से सारे पेपर ले लीजिए, एकता ने पांडे जी को भी बात कर ली थी और मैंने भी पांडे जी से बात कर ली थी, तो खान साहब ने सारे पेपर पांडे जी से ले लिए। पिछले 10 दिन से अब यह काम इसरार खान करा रहे हैं।उसने सारे काम करा लिए हैं बीच-बीच में चुप हो गया था, मेरा फोन भी नहीं उठाता था, मैसेज का जवाब भी नहीं देता था। एक बार फोन उठाया तो कभी कहा मैं बाहर गया हुआ था, कभी कहा कि यूनिवर्सिटी बंद है, अन्य कई बहाने।यह हालत हो गई कि क्या किया जाए, इसरार खान काम करा नहीं रहा है, वह गया जरूर था यूनिवर्सिटी, बीच-बीच में छुट्टी भी हो गई, मुझे पहले तो बताया था उसने कि मैंने तेवतिया से बात कर ली है, तेवतिया ने यह सब काम  कराने के लिए वहां संबंधित से कहा, कभी रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहा है, उसने स्वयं रिकॉर्ड रूम में जा कर देखा जो मिल गया था। भागदौड़ तो खान ने बहुत की है मगर काम तो पूरा नहीं हुआ। बीच में वह चुप ही हो गया।  एक हफ्ते तक चुप हो गया, मुझे बहुत चिंता हुई। होटल तानसेन का जो मैनेजर है श्री दंडोतिया उसने काम किया ही नहीं। वह मेरी बात नहीं मानता है और वहां का रीजनल मैनेजर है वीरेंद्र राणा वह मेरे नाम से वैसे ही काम कराना नहीं चाहेगा, मेरा फोन भी नहीं उठाता है। फिट 3 सितंबर को जन्माष्टमी के दिन श्री ओपी कपूर से बात की। श्री कपूर हमारे मध्य प्रदेश टूरिज्म में बॉस रहे हैं जबकि मेरा उनसे कोई अच्छा संबंध नहीं रहा, हमेशा बिगाड़ ही रहा है। उससे मैंने बात की, उसने कहा मैं राणा को बोल देता हूं। मुझे ऐसा लगता है उसने ने राणा से बात की होगी। 4 सितंबर को फिर खान साहब से बात हुई उसने फोन उठा लिया था। उसने कहा 'मैं कल जा रहा हूं,  कल वह गया भी था यूनिवर्सिटी।और आज 5 तारीख को भी वह गया था और जितने भी औपचारिकताएं है उसने पूरी की है । उसने आज मेरे को बताया कि वह तेवतिया से बात कर चुका है और संबंधित लिपिक से भी बात की है उसको लिफाफे दे दिए हैं । सब दस्तावेज दे दिए हैं और वह कल मुझे दे देगा, मगर कल ऐसा हो सकता है कि पूरे मध्यप्रदेश में पूरा प्रदेश बंद है, हड़ताल है, इसलिए कोई भी ऑफिस, दुकान कुछ नहीं खुलेगी, 144 धारा भी लगी हुई है। फिर भी खान ने कहा कि मैं फोन करूंगा उस संबंधित व्यक्ति को यूनिवर्सिटी में अगर वह ऑफिस आता है तो मैं कल उनसे यह संबंधित सर्टिफिकेट ले लूंगा। अगर मुझे नहीं लगता है कि वह कल ऑफिस आ पाएगा और कल हमारा काम हो पाएगा। मैंने कई लोगों को देखा है इस समय एक विजय अग्रवाल से भी मैंने बात करी थी ग्वालियर में वह हमारे साथ में अकाउंटेंट थे और बाद में ग्वालियर से रीजनल मैनेजर के पद पर रिटायर हुए हैं, उनसे भी मैंने बात की थी उसने हाँ हाँ करते हुए कहा 'कि मैं बीमार हूं, मैं करूंगा काम को, जाऊंगा यूनिवर्सिटी। फिर मैंने उनको बताया कि मेरा काम इसरार खान के पास में है, उसको आप कहते हैं, उसने कहा कि उस पर क्या भरोसा किया जा सकता है ! अग्रवाल ने खान को फोन किया और उसे कहा कि चौहान साहब का काम करा दीजिए। तो इस तरह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ग्वालियर में और किस तरह का संघर्ष मुझे भोपाल में करना पड़ा। एक बात तो है जब व्यक्ति नौकरी में रहता है अपने पद पर रहता है तो उस समय सारे काम दूर बैठे भी हो जाते हैं और नौकरी के बाद में फिर बहुत परेशानी होती है जहां अच्छे संपर्क भी होते हैं वह भी बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। तो इस प्रकार यह अनुभव हैं कि काम कराना बहुत मुश्किल है। बीच-बीच में तो मैं यह सोच रहा था कि मैं खुद चला जाऊं। यदि 1 दिन में काम हो जाएगा यह मुझे मालूम था कि नहीं होगा, इसलिए मैं नहीं गया। दूसरा होटल में ठहरा वहां तो बहुत खर्चा होगा, कई दिन रहना पड़ सकता है। 4 सितंबर को खान से बात भी की, उसने फोन उठा लिया था, उसने कहा लगभग सारा काम गया था और आज 5 तारीख को भी हो गया था। कल ऐसा हो सकता है कि पूरे मध्यप्रदेश में पूरा प्रदेश बंद है, हड़ताल है, इसलिए कोई भी ऑफिस दुकान कुछ नहीं खुलेंगे। 4 सितंबर को खान से बात भी की, उसने फोन उठा लिया था। मुझे नहीं लगता कि 6 तारीख को काम हो पाएगा क्योकि जब यूनिवर्सिटी खुलेगी ही नहीं तो कैसे काम होगा ! अब प्रतीक्षा है यूनिवर्सिटी खुलने की 7 सितंबर को और काम पूरे होने की आशा। धैर्य की भी एक सीमा होती है, परंतु रखना तो पड़ेगा ही।