Monday, September 10, 2018

मेरा गाँव अल्लिका

मेरे गांव का नाम अल्लिका है। जिला पलवल से पश्चिम में 10 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यहां लगभग 700 घर हैं और कुल आबादी लगभग 7000 है। जाट जाति की बहुलता है मेरे गाँव में। हरिजन, बाल्मीकि, नाई, कुम्हार,  ब्राह्मण भी रहते हैं, कई घर धोबियों के भी हैं। मेरा गाँव लगभग 500 वर्ष पहले यह गांव बसा। बसावट से अब तक 19वीं और 20 पीढ़ी भी चल रही है।
आज हमारे इस गांव में शिक्षा शत प्रीति सत चल रही है। अभी पिछले दिनों सर्वे हुआ था उसके अनुसार 0 से 14 वर्ष के बच्चों का पढ़ाई के आंकड़े इकट्ठे किये गये, जिसके अनुसार पाया गया कि कुल 887 बच्चों में से जो भी स्कूल जाने योग्य है वे बच्चे सभी स्कूल जा रहे हैं। यह जान कर बहुत अच्छा लगता है। गांव में दो स्कूल हैं, एक हायर सेकेंडरी 12वीं तक और दूसरा प्राइमरी स्कूल है, पांचवीं तक। जब हमारा देश आजाद हुआ था सन 1947 में तब एक स्कूल था प्राइमरी, फिर मिडिल बना। और बाद में हाई स्कूल और फिर हायर सेकेंडरी स्कूल बना। और प्राइमरी शाखा अलग कर दी गई। पहले, आजादी से पहले यहाँ प्री प्राइमरी 1 से 3 तक का स्कूल था। बच्चे लोग आगे पढ़ने के लिए गांव धतीर जाते थे, जहां 4थी एवं 5वीं की कक्षाएं लगती थी। उसके बाद गांव पृथला के स्कूल में दाखिला लेना पड़ता था। धतीर 4 किलो मीटर और पृथला 9 किलो मीटर पड़ता है। बहुत कम ही बच्चे पढ़ने के लिए जाते थे। उनके मां बाप अपने बच्चों को बहुत ही कम भेजते थे।
जाटों के बहुल इस गांव में कृषि मुख्य व्यवसाय है। पिछड़ी जाति के लोगों के पास कृषि भूमि नहीं है। इस लिए वे लोग मजदूरी करते आ रहे हैं। आज के समय में जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया, पढ़ाई आगे बढ़ती गई और लोग, चाहे वे उच्च वर्ग के हों या पिछड़ी जाति के, शहर में जा कर योग्यता अनुसार नौकरी करने लगे हैं। आज हमारे गांव के लोगों में से जज भी हुएं हैं, सरकारी  बड़े अधिकारी हुएं हैं, प्रोफेसर, डॉक्टर और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में देश विदेशों में नौकरी करते हुए। ये सब हमारे लोगों की पढ़ाई के बारे में आगे बढ़ने की पृवत्ति का ही फल है। गर्व होता है ये सब देख कर और सुन कर।
जहां एक तरफ पढ़ाई की ओर इतना अग्रसर है मेरा यह गांव, दूसरी तरफ दिल को चोट पहुचाने वाली दुःखद बाते भी हैं। लोगों में शराब की, दूसरे प्रकार के नशे की आदत भी बहुत पाई जाती है। शराब के कारण बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं और मर रहे हैं। नए नए लड़के मर रहे हैं। और हमेशा इन लोगों के घरों में झगड़ा होता है। इसका कारण मां बाप को भी जाता है क्योंकि वे भी इसी लत से घिरे हुए थे। उनसे ही देख कर आदत में ले लिया उनके बच्चों ने। और आत्म हत्या, हत्या भी तो हो रहीं हैं।
राजनीति के स्तर की गिरावट के कारण गांव में गुटबाजी बन गई। एक दूसरे को खत्म करने पर तुले हो जाते हैं। कोशिश करते हैं कि विरोधी को पुलिस में दे दिया जाए, फसा दिया जाए और यहां तक उसकी हत्या कर दी जाए।
परिवार बढ़ने से जमीन कम हो गई है अपने अपने हिस्से की। संयुक्त परिवार नहीँ रहे। पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने के लिए आज की पीढ़ी उठाने के लिए तैयार नहीं है। चाहे बेटा हो या बहु आए घर में, घर की व मां बाप की जिम्मेदारी कोई नही उठाना चाहता। ऐसा अधिकांश हो रहा है।
1958 में बाढ़ आई:
एक समय मैंने ऐसा भी देखा है जब बाढ़ आ गई थी मेरे गांव में सन 1958 में। मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ता था । बहुत बड़ी बाढ़ आई थी, पूरा इलाका डूब गया था, मेरा गांव पूरा डूब गया था । गांव में ऊंची वाली जगह ही थी अन्यथा आसपास का पूरा पूरा इलाका  पानी से भरा हुआ था। यह हालत थी कि जो लोग ऊपर वाले घरों में रह रहे थे उनको बाहर जाने के लिए उनको सौच जाने के लिए भी जगह नहीं । उस समय का नजारा मुझे आज ही याद आ रहा है । ऐसी हालत थी उसको देख कर आज भी हम घबरा जाते हैं । लोग मेरे गांव के लोग अपने मवेशियों को लेकर अपने-अपने रिश्तेदारियों में चले गए थे और वही 3, 4 महीने रहे और तब तक नहीं आए जब तक बाढ़ का पानी नीचे नहीं उतर गया हो । हम लोग और चाचा अमीलाल के पिताजी सब मवेशियों को लेकर पृथला गाँव चले गए थे । उस समय मेरे बड़े भाई भीम सिंह की शादी हुई थी । उस समय हम दोनों रिश्तेदारियों में बहुत बड़ा प्यार था । उन्होंने कहा था आप मुसीबत के समय हमारे गांव आइए और हमारे घर पर ही रहिए और हम वहां चले गए लगभग 3, 4 महीने वहां पर रहे । मुझे याद आ रहा है वह बचपन का समय कि हम वहां रहते थे ।

गांव की संस्कृति:
इस गांव के लोग लगभग 500 वर्ष पूर्व राजस्थान से आए थे और वहां की संस्कृति भी अपने साथ लाए थे। मैंने अपने ही बचपन के समय में देखा है । यहां के लोगों का रहना सहना पहनना राजस्थान की संस्कृति से मिलता था । लोगों का पहनावा राजस्थान के पहनावे जैसा था। सिर पर पगड़ी पहनते थे कमर के नीचे आधी धोती पहनते थे और शरीर को ढकने के लिए कुर्ती पहनते थे। जिसमें घुंडी दार कपड़े का ही बना हुआ गांठ दार बटन होता था । ऐसा भी पाया जाता था कि कुछ लोग कानों में सोने का आभूषण पहनते थे। जिसको पुरुष लोग भी पहनते थे इसको मुरकी बोलते थे। कान सबके छिदे रहते थे। और महिलाओं का पहनावा इस प्रकार था की जैसे अभी भी दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में राजस्थान में पहनावा पाया जाता है। वक्ष को ढकने के लिए अंगिया पहनते थे। और कमर से पैरों तक आने के लिए घाघरा पहनते थे। बाकी शरीर को ढकने के लिए कुछ भी नहीं पहनते थे। एक ओढ़ना होता था जो सिर पर ढका जाता था और उसी से ही घागरे में अटका कर पूरे शरीर को ढक लिया जाता था । आभूषण के तौर पर पैरों में चांदी के आभूषण होते थे जिनमें करूला, पाज़ेब आदि कहलाते थे । सिर पर बाल में अटकाते  हुए बोरला पहनती थी । नाक में नथ या बूरा पहनती थी, वह छोटे बड़े आकार की हुआ करती थी । गले में सोने की हसली, हार, मोहर, आदि पहनती थी । देखते देखते सब बदल गया । पुराने गहने बदल गए । औरतों का पहनावा बदल गया । पुरुषों का पहनावा बदल गया । 50 के दशक में मैंने जो देखा था वह मैंने ऊपर लिखा है और यह 70 के दशक तक चलता गया और उसके बाद इस तरह का पहनावे में और आभूषणों में बदलाव आता चला गया। गांव में लोग शिक्षित होने लगे। पहनावे में भी बदलाव आने लगा। 80 के दशक के बाद बदलाव तेजी से आने लगा। नए-नए जो लड़के आ रहे थे और मैं पेंट कमीज और कच्छा पहनते थे । पुरुष आभूषण के नाम का कुछ नहीं पहनते थे। वह जो कान में मुरकी पहनते थे अब नही पहनते थे। और औरतों में पुराने समय के जो मैंने देखा था 50 और 60 के दशक में जो पहनावा था वह तेजी से बदलने लगा। अंगिया का पहनावा और घागरा का पहनावा 70 के दशक के बाद खत्म सही हो गया था । घागरे की जगह पेटीकोट ने ले ली और धीरे-धीरे आज स्थिति यह है कि यह घागरा पेटीकोट आज खत्म हो गया । अंगिया तो देखने को नहीं मिलती है । अंगिया का स्थान 70 दशक में ही कमीज ने ले ली। 1947 के बाद में भारत के विभाजन के बाद सभी लोग जब भारत आए, तो यह अपना छोटा छोटा व्यापार सड़कों पर कपड़ा बिछाकर करने लगे और गांव में फेरी लगाकर रोज जरूरत की चीजें बेचने लगे, उनमें कमीज और कच्छे भी बेचा करते थे। कि लोगों ने उसे कमीज और कच्छे लेने शुरू किए। पुरुषों ने और महिलाओं ने भी कमीज और कच्छों का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया । बहुत हद तक हमारे गांव में और सभी इलाकों में इन पंजाबी शरणार्थियों के फेरी वाले व्यापारियों ने गांवों के पहनावे पर बहुत असर डाला। और वह राजस्थान का जो पहनावा था वह प्राय समाप्ति हो गया । आज हम कह सकते हैं शत प्रतिशत महिलाएं अब पंजाबी सूट सलवार ही पहनती है। पुराने जो महिलाएं हैं अपवाद के रूप में देखी जाएगी कि पेटीकोट और कमीज ही पहनती और इसी प्रकार पुरुषों में अभी है धोती पहने हैं, आधी धोती होती है। नीचे कक्षा जरूर पहनेंगे, पहले कक्षा नहीं पहनते थे और ऊपर कमीज कुर्ता कुर्ता पहनते हैं । इस प्रकार गांवों का पहनावा पहले क्या था और अब क्या है, यह मैंने अपने जीवन के इन 70 साल में देखा है । बड़ा तेजी से बदलाव आया।
गाँव में औरतों का पहनावा
जब दुल्हन पहली बार ससुराल शादी में और गोने में जाती थी तो तीहर, जिनमें घागरा, कमीज और ओढ़ना होता था, उसको अंगिया से बांधते थे। पहले घाघरे अवश्य देते थे। फिर या भी बदल गया, घाघरे का चलन खत्म हो गया।
आभूषणों में हसली, मोहर, गुलिबन्द, जौ माला, कानो की बूचनी, नथनी, बंदनी, घुंगट, चांदी का चुटीला, बोरला, हथफूल, हाथ के करूला, गजरे हाथों के, छन हाथों के, डार हाथों की, दुआ हाथों के, पछेरी हाथों की, पावों के करूला, पायजेब, छैल करे, नेवरी, गठिया, पाती, चांदी की अंगिया, तागड़ी, नाडा, कठला, आदि पहनी थीं नई दुल्हन। ये सब 1980 के दसक तक चलन में रहा। फिर धीरे धीरे खत्म हो गया।
पहले मिसानों के हर परिवार के पास में दो घर हुआ करते थे। एक घर हुआ करता था जिसमें महिला और बच्चे रहते थे। दूसरा एक बैठक हुआ करती थी जिसको नौहरा कहते थे । और यूपी में यमुनापार इलाके में उसको घेर बोलते हैं । परन्तु  दो मकान जरूर हुआ करते थे ।उस बैठक में  गाय भैंस व बैल फालतू पशु रहा करते थे। और पुरुषों के लिए बैठक हुआ करती थी । वहां खाट बिछाई हुआ करती थी । और आवश्यक रूप से हुक्का रखा हुआ करता था ।  हुक्के पर आसपास के लोग सिर्फ हुक्का पीने के लिए वहां आया करते थे । सामाजिक सद्भावना बना कर रखते थे। यह पूरे हरियाणा में और जाट बहुल इलाके में सभी जगह चाहे दूरस्थ हरियाणा हो या यमुना पार का का क्षेत्र, यह जाट, गुर्जर, यादव निवासित क्षेत्र हुक्का पर बैठे हुए लोग आपस में भाईचारे की बात करते थे । अपने दुख सुख की बात करते थे। कोई समस्या हो उस को निपटाने की बात करते थे। तब यह हुक्का बैठक में रखा हुआ करता था । दूसरी तरफ पाया गया कि जब किसान अपने बैलों को लेकर सुबह सुबह खेत जोतने के लिए घर से बाहर निकलता था तो अपने साथ एक छोटा सा हुक्का भी ले जाया करता था। उसको कली बोलते थे । और खेत में काम करते करते थक जाने के बाद जब वह थोड़ा आराम करते थे तो वहीं पर ही वह अपने इस छोटे से हुक्के को पीते थे। हुक्के में एक चिलम रहती है । उस चिलम के अंदर तंबाकू रखकर आंच के छोटे-छोटे टुकड़े रखते थे। गांव में जाट जाति की बहुलता है। यह लोग किसान इनके पास में जमीन है और यह खेती करते हैं । वर्ष भर में दो बार फसल बोई जाती है । एक खरीब की और दूसरी रवि की फसल। खरीफ की फसल मानसून या बरसात काल में बोई जाती है और रवि की फसल नवंबर में बोई जाती है जो मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है । ज्यादातर खरीब की फसल में ज्वार बाजरा बोया जाता था। कुछ लोग मक्का और कुछ दाल भी बयां करते थे और कपास भी बोलते थे। रवि की फसल में उस समय मैंने देखा है 50 के दशक में पानी के साधन नहीं थे, चना बोते थे, जौ बोते थे, गेहूं बहुत कम हुआ करता था । गेहूं और चना मिलाकर जिसको गोचनी बोलते थे, और जौ व चना मिला कर जिसे बेझर बोलते थे खेतों में बोया करते थे । इस तरह की खेती हुआ करती थी । पानी के साधन न होने के कारण किसानों की आधी से ज्यादा जमीन बोई नहीं जा सकती थी। खेती का उत्पादन ज्यादा नहीं हुआ करता था । लोग निर्धनता में जिया करते थे।

स्वास्थ सुरक्षा के नाम पर यहां पर कोई सुविधा नहीं थी। मुझे याद है अभी भी यदि कोई खास बीमारी होती थी तो पलवल यहां से 10 किलोमीटर जाते थे । पैदल जाया करते थे या फिर घोड़ा तांगा चलता था जो सुबह जाता था शाम को आता था उसमें जाया करते थे । पलवल में सरकारी अस्पताल था और मिशन हॉस्पिटल भी था और क्रिश्चियन हॉस्पिटल भी था । वहां अपना इलाज किया कराया करते थे । प्राइवेट डॉक्टर भी बैठा करते थे। मुझे भी याद है उस जमाने में मूलचंद डॉक्टर हुआ करते थे। और सरकारी अस्पताल में भी था, उसका भी मुझे याद है। आज मेरे इस गाँव में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र है अर्थात एक छोटा सा अस्पताल है यहां के चिकित्सा अधिकारी प्रभारी डॉ संजय सिंह बहुत मेहनत करते हैं। यहां का अनुशासन बहुत अच्छा है । साफ सुथरा है । आज के दिनांक में बहुत सुविधा है मरीजों के लिए । 6 बिस्तर मरोजों को प्रवेश देने के लिए। उसने आज मुझे बताया यहां महिलाओं की डिलीवरी भी होती है । पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर उपलब्ध है, डेंटिस्ट है, हर शुक्रवार को आंखों का डॉक्टर आता है और महिला डॉक्टर तो प्रतिदिन यहां बैठती हैं । डॉक्टर संजय ने बताया कि यहां पर 29 गांवों का केंद्र है । आज मैंने देखा यहां गर्भवती महिलाएं बहुत संख्या में इकट्ठी हुईं बैठी हैं । मैंने डॉक्टर संजय से पूछा कि यह कौन लोग हैं जो आज की डेट भीड़ में इकट्ठी हुई है। उसने बताया कि आज इनका एक विशेष रूप से चेकअप का दिन रखा गया है । डॉक्टर महिला ने अभी गर्भवती महिलाओं का चेकअप करना है और यही यही इन को आगे निर्देश देना है कि किन-किन बातों का ख्याल रखना है । डॉक्टर साहब ने बताया कि आज के दिन हमने बाहर से कांटेक्ट पर लैब टेक्नीशियन भी बुलाए हुए हैं जो इन गर्भवती महिलाओं का आवश्यक रूप से खून और अन्य निरीक्षण भी करेंगे। मैंने अस्पताल में एक ₹2,00000/- के चेक का लैमिनेटेड पोस्टर लगा हुआ देखा। मैंने उसके बारे में पूछा तो डॉक्टर संजय ने बताया कि यह हमें अच्छे कार्यों के लिए चीफ मिनिस्टर की ओर से ₹2,00,000/- का चेक मिला है और उसको हमने आवश्यक रूप से सुविधाएं बढ़ाने के लिए हॉस्पिटल के कार्य में ही खर्च किया है । पर्याप्त मात्रा में दवाइयां मिलती हैं,  स्टाफ नर्स है, इमरजेंसी के समय 24 घंटे डिलीवरी का कार्य किया जाता है। इस प्रकार की सुविधाओं को देखकर मुझे आज बहुत अच्छा लगा कि मेरे गांव में इतना साफ सुथरा और इतना अच्छा हॉस्पिटल है । इतने अच्छे डॉक्टर हैं और बहुत ही अच्छी तरह से अनुशासन को कायम रखते हुए अस्पताल का संचालन किया जा रहा है । हमें गर्व है ऐसी इकाई पर।

शिक्षा के कार्य में पहले यहां पर 1928 से पहले कोई भी स्कूल नहीं था । फिर एक प्राइमरी स्कूल आया जिसमें 1 से 3 कक्षा तक पढ़ाई हुआ करती थी। उसके बाद हमें बच्चों को पास के गांव जो यहां से 4 किलोमीटर दूर होगा कम से कम वह भेजना पड़ता था । उस गांव का नाम है धतीर । वहां सिर्फ दो क्लास लगती थी चौथी और पांचवी क्लास । उसके बाद छठी, सातवीं व आठवीं के लिए गांव पृथला चला जाना पड़ता था जो यहां से 12 किलोमीटर दूर स्थित है । पहले शिक्षा पाने के लिए कोई सुविधा नहीं थी और आज आजादी के 71 साल के बाद में मेरे इस गांव में मुझे इस बताने में खुशी होती है कि यहां पर कि एक हायर सेकेंडरी स्कूल है जिसमें 12वीं तक शिक्षा दी जाती है और एक प्राइमरी स्कूल है जहां एक से लेकर पांचवी तक शिक्षा दी जाती है । दोनों स्कूलों में अच्छा स्टाफ है। प्राइमरी स्कूल में मेरी बिटिया मधु चौहान मेरी बड़ी बिटिया है, यहां पर स्कूल की प्रभारी है 2016 से। वह इस स्कूल में पदस्थ है और प्रभारी के रूप में कार्य कर रही है। हायर सेकेंडरी स्कूल में बहुत अच्छा स्टाफ है। वहां भी बहुत कार्य किया है, बहुत अच्छी बिल्डिंग है बहुत बड़ा ग्राउंड है और अध्यापक लोग बहुत मेहनत करते हैं । परन्तु सरकारी होने के कारण स्कूल के भवन का रखरखाव अच्छा नहीं है और अंदर का जो कार्य है उसमें भी बहुत सुधार की बहुत जरूरत है । लगभग 10- 15 सालों से दोनों स्कूलों में,प्राइमरी स्कूलों में स्कूल में और हर सेकेंडरी स्कूल में भी, पुराना फर्नीचर टूटा हुआ पढ़ा हुआ है, पहले तो बाहर आंगन में ही पड़ा था अब उसको उठाकर छत पर रख दिया है, उसको राइट ऑफ करने की जरूरत है । मगर शिक्षा विभाग इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है । मैंने जो लिखा था 14 में शिक्षा विभाग को कि इस पुराने फर्नीचर को नीलाम कर दिया जाए या नष्ट कर दिया जाए परन्तु मेरे इस पत्र पर किसी ने ध्यान नहीं किया । आज शिक्षा की स्थिति बहुत अच्छी हो गई है । जहां पहले आजादी के बाद कुछ ही लोग स्कूल जाते थे आज 100% बच्चे स्कूल जा रहे हैं। यह गर्व की बात है । मैंने अभी वह रिपोर्ट देखी है जिसमें सरकार ने सर्वे कराया था कि 14 साल तक के बच्चों की स्थिति क्या है कि कितने स्कूल जाते हैं और कितने स्कूल नहीं जाते हैं । रिपोर्ट में मैंने पाया कि 887 बच्चों में से जितने भी बच्चे स्कूल जाने लायक हैं वे सभी बच्चे स्कूल जाते हैं अर्थात शत-प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे हैं । यह भी हमारे लिए बहुत ही बड़ी उपलब्धि है। राष्ट्रीय स्तर पर मेरे देश में 1947 में आजादी के समय आजादी के मिलने से पहले शिक्षित वर्ग का प्रतिशत मात्र 17% था और आज वह बढ़कर 74 प्रतिशत हो गया है । मेरे इस गाँव के लोगों में से आज जज भी हुए, अनेकों वकील है, अनेकों अच्छे-अच्छे पदों पर रहे हैं, बहुत बच्चे मेरे गांव से विदेशों में नौकरी करते हैं, डॉक्टर है। बहुत अच्छे बहुत अच्छा लगता है यह सब देख कर । और इंजीनियर तो मेरे गांव में बहुत है। कुछ लोग अपना व्यवसाय करते हैं । हमारे गांव के लोगों में से ही किसी ने एक हॉस्पिटल भी बना लिया है। बहुत लोग प्रॉपर्टी डीलर का काम करते हैं। शहरों में जाकर बस गए । हमारे देश के बड़े शहरों में ही नहीं विदेशों में भी जाकर बस गए, अमेरिका में रहते हैं, इंग्लैंड में रहते और चीन में भी रहते हैं। बड़ा अच्छा लगता है जब हमारे बच्चे विदेश पढ़ने के लिए जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य है।

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