Tuesday, December 2, 2025

 परिवार के सहयोग और रिश्तों की संवेदनशीलता

 

जीवन में परिवार वह आधार होता है, जहाँ हम सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। शादी-विवाह जैसे पवित्र अवसरों पर सभी परिजन अपनी-अपनी क्षमता और सुविधा अनुसार योगदान देते हैं। हर परिवार में कुछ लोग आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं, कुछ समय और श्रम से योगदान देते हैं, और कुछ अपनी उपस्थिति और शुभकामनाओं से भी हमारी खुशियों को पूर्ण कर देते हैं।

 

मेरी बेटी मधु की शादी के समय भी यही उम्मीद थी कि परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर पर साथ दें, आशीर्वाद दें और खुशियाँ बांटें। परिवार का साथ हर माता-पिता के लिए सबसे बड़ा संबल होता है।

भीम सिंह का योगदान और वास्तविकता

मेरे भाई भीम सिंह ने इस विवाह में आर्थिक रूप से सहयोग नहीं किया। लेकिन यह भी सत्य है कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग होती हैं — कई बार मन में इच्छा होते हुए भी परिस्थितियाँ साथ नहीं देतीं। इस बात को समझना और स्वीकार करना भी परिवार की परंपरा का हिस्सा है।

हाँ, यह भी सच है कि शादी के दौरान दौड़-भाग और कामकाज में उन्होंने कुछ हद तक भागीदारी अवश्य निभाई। उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार साथ देने का प्रयास किया — यही हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है।

उनके बच्चों की बात करें तो वे शायद अपनी व्यस्तताओं, अनुभवहीनता या उम्र-समझ के कारण सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो सके। युवा पीढ़ी कभी-कभी इन पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझने में समय लेती है — इसलिए हम इसे भी सहज भाव से स्वीकार करते हैं।

उधार सामान दिलाने में अपेक्षित सहयोग न मिलना

शादी-व्यवस्थाओं में कई छोटी-बड़ी जरूरतें होती हैं। कुछ मौकों पर उधार सामान की व्यवस्था में मदद की अपेक्षा थी, जो पूरी नहीं हो पाई। हालाँकि, जीवन ऐसा ही है — हर कोई हर वक्त उपलब्ध हो, यह आवश्यक नहीं। शायद उस समय परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं।

हमारा उद्देश्य किसी पर दोष लगाना नहीं है, बल्कि यह कहना है कि जहाँ थोड़ी-सी मदद मिल जाती, वहाँ और भी अच्छा हो सकता था। परिवार में संवाद और सहयोग की परंपराएँ इसी तरह बनती हैं — समझ के साथ।

सकारात्मक दृष्टिकोण और सीख

 

जीवन सिखाता है कि रिश्ते कड़वाहट से नहीं, बल्कि समझ, धैर्य और सम्मान से मजबूत होते हैं। मधु की शादी हमारे परिवार के लिए एक भावुक और गर्व का अवसर था।

कुछ सहयोग की कमी महसूस हुई, पर यह भी सच है कि हम सब अपनी-अपनी सीमाओं और परिस्थितियों में जीते हैं। शिकायतों से अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हम रिश्तों को प्यार और सम्मान से आगे बढ़ाएँ।

हम मानते हैं कि भविष्य में और बेहतर समझ और सहयोग के साथ परिवार के रिश्ते और मजबूत होंगे।

अंत में

परिवार का असली धन प्रेम, अपनापन और साथ है।

हमारी कोशिश यही है कि हर अनुभव हमें और परिपक्व बनाए, और हम सब इस भाव से आगे बढ़ें —

> “जो बीत गया, वह सीख बन जाए; जो आने वाला है, उसे प्यार और मिल-जुलकर सजाया जाए।”

 भाई का आगमन, बहन का अभिमान

विवाह का अवसर केवल उत्सव नहीं होता; यह रिश्तों की बारीकियों, भावनाओं की गहराइयों और परंपराओं की गरिमा को फिर से जी लेने का समय होता है। हमारे समाज में भात भरने की परंपरा भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है। जब भाई बहन के घर भात लेकर आता है, तो वह केवल चावल नहीं लातावह अपने साथ मायके की पहचान, अपनत्व और सम्मान भी लेकर आता है।

मेरी पत्नी राजवती के जीवन में यह क्षण विशेष महत्व रखता था। बचपन में ही माँ चल बसीं, सगे भाई-बहन भी जीवित नहीं रहे। पिता ने पुनर्विवाह किया और सौतेले भाई प्रवीण का जन्म हुआ। समय कठिन थामाता मानसिक रूप से अस्थिर, पिता भी अब इस संसार में नहीं रहे। पाँच एकड़ ज़मीन पट्टे पर देकर किसी तरह जीवन चलता है।

ऐसे हालात में भी प्रवीण, जो अभी मात्र 14–15 वर्ष का था, 21 फ़रवरी 2000 को अपनी बहन के घर भात लेकर आया। गरीबी ने उसे झुकाया नहीं, बल्कि रिश्ते ने उसे खड़ा किया। यह उसके संस्कार, उसकी सच्चाई और बहन के प्रति उसके सम्मान का प्रमाण था।

कभी मन में विचार आया था कि भात का न्योता दें। जीवन में कुछ अवसरों पर अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, और मन में शिकायतें बनी रहीं। पर जब दिल से सोचा, तो समझ आयादोष व्यक्ति का नहीं, परिस्थिति का था। मेरे ससुर सरल और सीधे थे, पर समाज और वातावरण ने उन्हें उलझा दिया था; उनके मन में बुराई कभी नहीं थी।

और जब वह छोटा भाई द्वार पर खड़ा था, तब सारा मनमुटाव हवा हो गया। उस क्षण की गरिमा बहुत बड़ी थी। द्वार पर खड़ी राजवती की आँखें भर आईं। उसने अपने भाई का आदरपूर्वक स्वागत किया। उस पल उसकी आँखों में केवल खुशी नहीं थीवहाँ वर्षों का दर्द, यादें, तन्हाई और अचानक लौट आया अपनापन भी था। उसे लगा मानो उसका मायका फिर से उसके सामने उपस्थित है, माँ-पिता का स्नेह फिर छू गया हो।

भात की थाली में वस्तुएँ कम थीं, पर भावनाएँ अनमोल थीं। वह क्षण केवल रीति का पालन नहीं था, बल्कि रिश्ते की पुनर्स्थापना थासम्मान और प्रेम का उत्सव था।

उस दिन विश्वास फिर दृढ़ हुआ किरिश्ते खून से नहीं, दिल की निष्ठा से निभते हैं। और जब भावना सच्ची हो, तो सादगी भी स्वर्ण बन जाती है।

**संदेश:**

जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, यदि मन से रिश्ते निभाए जाएँ तो वे समय की साक्षी बनकर अमर हो जाते हैं। 

 बदन सिंह चौहान 

08 नवम्बर 2025                                             स्थान – मेरा गाँव अल्लीका,

जिला पलवल (हरियाणा)

 

बेटे की शादी – एक याद और एक संघर्ष

वर्ष 2007, दिनांक 7 जुलाई — मेरे बेटे का विवाह भोपाल स्थित मध्यप्रदेश पर्यटन निगम की इकाई होटल पलाश रेज़िडेंसी में संपन्न हुआ। बारातियों के ठहरने की व्यवस्था होटल लेक व्यू अशोक में की गई थी। उस समय मैं इंदौर में पदस्थ था। यह भी अपने आप में एक कहानी है — मेरा तबादला भोपाल से इंदौर मंत्री महोदया की नोट के आधार पर कर दिया गया था, जो सामान्यतः ऐसा नहीं होता। कारण स्पष्ट था — मुख्यालय के कुछ अधिकारियों से मेरे संबंध सहज नहीं रहे थे। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी अधिकारी के विरुद्ध कुछ लिखना नहीं है, बस इतना ही कहना है कि उस समय जो मानसिक पीड़ा मुझे झेलनी पड़ी, वह आज भी याद आती है।

बारात से ठीक पहले

शादी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। बारात की रवानगी से मात्र दस मिनट पहले मेरी सरकारी गाड़ी तत्काल प्रभाव से वापस ले ली गई। उस क्षण मुझे अत्यंत कष्ट हुआ। एक पिता, जो अपने बेटे की शादी में भावनाओं से भरा हुआ था, उसके सामने यह स्थिति बहुत तकलीफ़देह थी।

सहयोग नहीं, अड़चनें मिलीं

निगम की ओर से किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिला। उल्टा जहाँ तक संभव हुआ, अड़चनें डाली गईं। निगम का एक आदेश था कि निगम के कर्मचारियों के बच्चों की शादी में, निगम की इकाइयों में lodging और boarding पर 50% की छूट दी जाएगी — वह भी केवल एक बच्चे की शादी तक सीमित। यह “एक बच्चे की शादी” का नियम मुझे आज तक समझ नहीं आया। मैंने तत्कालीन प्रबंधक संचालक श्री अश्विनी लोहानी से निवेदन कर 50% की अनुमति प्राप्त कर ली।

छूट पर नई शर्तें

इसके बाद भी रुकावटें समाप्त नहीं हुईं। कहा गया कि छूट केवल एक बार भोजन पर मिलेगी। कुछ समय पहले रिंग सेरेमनी के अवसर पर, मैंने निगम की विंड एंड वेव्स इकाई में कुछ लोगों को भोजन कराया था, जिसमें बहुत ही छोटा डिस्काउंट मिला था। अब उसे आधार बनाकर कहा गया कि मैंने पहले छूट ले ली है, अतः विवाह में अब नहीं मिलेगी।

संघर्षमय पत्राचार

मुख्यालय और मेरे बीच कई पत्राचार हुए। मुझे विवश किया गया कि शादी में छूट तभी मिलेगी जब रिंग सेरेमनी के डिस्काउंट की राशि वापस जमा कराई जाए। बिल पर तो 50% डिस्काउंट ही था और कुल बिल की राशि भी बहुत थोड़ी थी। मैंने कई पत्र लिखे — यह तर्क देते हुए कि रिंग सेरेमनी भी विवाह का ही हिस्सा है। विवाह की व्यस्तताओं के बीच मैं निगम से संघर्षमय पत्राचार करता रहा। मैंने अनेक उदाहरण और संदर्भ दिए, कुछ मामलों में तो इसी प्रकार की छूट पूरे आयोजन पर दी गई थी, पर उनका उत्तर आज तक नहीं मिला।

भेदभाव और पीड़ा

मैंने यह भी उदाहरण दिया कि कुछ ही माह पूर्व एक अधिकारी की बेटी के विवाह समारोह में कार्यक्रम पूरे सप्ताह चला था, और उस पूरे समय का डिस्काउंट स्वीकृत हुआ था। वहीं दूसरी ओर, मुझे केवल एक समय के भोजन और एक ही रात्री के ठहराव पर छूट दी गई। बहुत से पत्र लिखे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अन्ततः मुझे रिंग सेरेमनी का वह छोटा-सा डिस्काउंट राशि वापस भरनी पड़ी, तब जाकर शादी के बिल में छूट स्वीकृत की गई।

पिता का मन

जिसके हाथ में शक्ति होती है, फिर किसी और की नहीं चलती। कितना कष्ट हुआ होगा उस पिता को, जो अपने बेटे की शादी कर रहा था, और साथ ही इस प्रकार के संघर्ष से गुजर रहा था। एक ओर बेटे का विवाह, दूसरी ओर नियमों और संवेदनाओं की ठोकरें — यह अनुभव जीवनभर की स्मृति बन गया।

अनुभव की सीख

समय बीत गया, बेटा अब अपने परिवार में खुश है। उसकी मुस्कान ही उस कठिन समय की सबसे बड़ी पूँजी है। इस पूरे प्रसंग ने मुझे यह सिखाया कि जब व्यवस्था में संवेदना का स्थान नहीं होता, तब उसका अर्थ खो जाता है। नियम आवश्यक हैं, पर उनमें यदि मानवीयता न हो, तो उनका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

·       “जहाँ कर्तव्य हो वहाँ भावना भी हो, जहाँ व्यवस्था हो वहाँ संवेदना भी — तभी किसी संस्था का हृदय जीवित रह सकता है।

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दो शादियाँ दो अनुभव

जीवन में कुछ अवसर ऐसे होते हैं जो केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि हमारे अनुभवों और भावनाओं की गहराई को भी उजागर करते हैं। मेरी पुत्री और पुत्र दोनों की शादियाँ मेरे जीवन के ऐसे ही दो अवसर रहे, जिनमें मुझे मध्यप्रदेश पर्यटन निगम से दो बिल्कुल अलग प्रकार के अनुभव प्राप्त हुए।

मेरी पुत्री की शादी,

जैसा कि पहले भी मैंने लिखा है, मेरे जीवन का एक अत्यंत भावुक और अविस्मरणीय क्षण था। उस समय मैं पर्यटन निगम में विशेष कर्तव्य अधिकारी (OSD) के रूप में कार्यरत था। निगम के प्रबंधक संचालक श्री अश्विनी लोहानी जी थे जिन्होंने स्नेह, संवेदना और परिवार जैसे भाव से मुझे सहयोग दिया।
शादी का आयोजन निगम की प्रसिद्ध इकाई विंड एंड वेव्स में हुआ था। पूरी व्यवस्था अत्यंत गरिमामय रही। हर छोटे से छोटे पहलू पर ध्यान दिया गया मेहमानों का स्वागत गुलाब के फूलों से हुआ, प्रत्येक अधिकारी को विशेष दायित्व सौंपा गया, और आयोजन के हर हिस्से में निगम परिवार की आत्मीयता झलक रही थी। उस समय मुझे लगा कि मैं वास्तव में एक परिवार के बीच हूँ। निगम के वरिष्ठ अधिकारी, अभियंता, और अधीनस्थ सभी ने जिस तरह से सहयोग और स्नेह दिया, उसने इस आयोजन को एक अविस्मरणीय स्मृति बना दिया।

पुत्र की शादी -

 किन्तु, जब समय आया मेरे पुत्र की शादी का, तो अनुभव बिलकुल भिन्न रहा।वह भी मेरे जीवन का  एक बड़ा और महत्वपूर्ण अवसर था, किंतु इस बार निगम की ओर से वह अपनापन और सहयोग कहीं दिखाई नहीं दिया।जिस संस्था ने एक समय बेटी की शादी को अपने परिवार का उत्सव बना दिया था, वही संस्था इस बार निर्जीव-सी प्रतीत हुई। ना किसी ने विशेष रुचि ली, ना कोई समन्वय हुआ।
शादी के दिन कोई अधिकारी उपस्थित होकर मेहमानों का स्वागत करता दिखाई नहीं दिया, न ही किसी ने गुलाब का फूल थमाया।जहाँ पहले हर कोने में स्नेह और व्यवस्था की झलक थी, वहीं इस बार असंवेदनशीलता और उदासीनता का अनुभव हुआ।

मुझे यह अंतर भीतर तक छू गया।एक ही निगम, एक ही परिवार, पर दो अवसरों पर दो बिल्कुल विपरीत अनुभव। मैं किसी से शिकायत नहीं करना चाहता, पर यह अनुभव इस बात का संकेत अवश्य देता है कि संवेदनशीलता और मानवीय जुड़ाव किसी भी संगठन की असली ताकत होते हैं।

मेरी बेटी की शादी में मिले सहयोग को मैं आज भी श्रद्धा से याद करता हूँ वह एक परिवारिक उत्सव था। और बेटे की शादी का अनुभव मुझे यह सोचने पर विवश करता है कि समय के साथ संवेदनाओं की वह गरमी क्यों और कैसे ठंडी पड़ गई।

फिर भी, मैं उस पुराने दौर की आत्मीयता और अपने सहयोगियों के स्नेह के प्रति आज भी कृतज्ञ हूँ।
आशा करता हूँ कि आने वाले समय में निगम अपने उसी मानवीय और पारिवारिक स्वरूप को फिर से जीवित करेगा, जिसके कारण वह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक परिवार कहलाता था।

वही मैं बदन सिंह, वही निगम और वही सभी लोग - पर अंतर केवल संवेदनाओं का है, जो पहले साथ थीं और अब कहीं खो गई हैं।

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