Tuesday, December 2, 2025

 10 माह तक वेतन नहीं मिला, पर आत्मसम्मान नहीं खोया

(एक परिवारमुखी ईमानदार कर्मचारी की सच्चाई की कीमत)


दिनांक: 02 नवम्बर 2025
बदन सिंह चौहान

सत्य कभी भी क्षमा माँगने की स्थिति में नहीं होता।
गलत ही घुटने टेकता है।” — महात्मा गांधी


जब ईमानदारी ने परीक्षा ली

जीवन में ऐसे भी दौर आते हैं, जब इंसान सम्मान के लिए लड़ता है, न कि पद या लाभ के लिए। मैं कोई विशेष सुविधा चाहने वाला व्यक्ति नहीं था बस अपने कर्तव्य को सत्य और नियमों के साथ निभाने वाला एक साधारण सरकारी कर्मचारी और परिवार का मुखिया था। परंतु सत्य को चुनने की कीमत कभीकभी इतनी कठोर होती है कि मन झकझोर उठता है। क्षेत्रीय प्रभारी, सतना के रूप में मैंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा और नियमों के पालन के साथ किया। वित्तीय अभिलेखों पर हस्ताक्षर से पहले सत्यापन आवश्यक था यह मेरा सिद्धांत था, और नियम भी। परंतु सत्ता का अहंकार सच को स्वीकार करने से अधिक विरोध करना जानता है। मेरे सत्यपरक निर्णयों से वे लोग असहज हो गए जिनके लिए औपचारिकता ही सत्य थी, और हुक्म पालन ईमानदारी।


सत्ता की ठोकरें और सत्य की मजबूती

मैंने गलत पर हस्ताक्षर करने से इंकार किया, और नतीजा यह हुआ कि बिना किसी कारण, बिना किसी जांच, मेरा वेतन रोक दिया गया एक माह के लिए नहीं, दस लम्बे, थकाऊ और पीड़ादायक महीनों के लिए। सत्य पर चलना आसान है, पर सत्य पर अडिग खड़े रहना कठिन। कुछ अधिकारियों का पदअहंकार इतना प्रबल था कि वे सच्चाई को दबाने और आत्मसम्मान को तोड़ने को अपनी जीत समझ बैठे। पर सत्य की राह पर खड़ा आदमी झुक सकता है टूटता नहीं।


कठिनाई हुई, पर झुकना नहीं सीखा

वह समय केवल मेरा परीक्षण नहीं था, बल्कि मेरे पूरे परिवार की परीक्षा थी। पांच सदस्यों का घर, बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च, बिजलीपानी के बिल, दवाइयों की जरूरतें सब कुछ मेरी तनख्वाह पर निर्भर था। जब आय का स्रोत रुक जाता है, घर के चूल्हे की चिंता इंसान के भीतर तक जलाती है। हर दिन घर लौटते हुए मैं चेहरे पर मुस्कान रखता, पर जेब की खालीपन दिल में दर्द बनकर उतरता। बच्चों ने कभी शिकायत नहीं की, पत्नी ने कभी चिंता नहीं जताई पर उनकी चुप्पी ही मेरा सबसे बड़ा संघर्ष थी। एकएक रुपया बचाना, जरूरतों को सीमित करना, सपनों को कुछ समय के लिए सुला देना यह सब हमारी मजबूरी नहीं, हमारा धैर्य था। हम टूटे नहीं परिपक्व हो गए।


तंत्र की बेरुखी और मेरे अडिग कदम

लगातार पत्र लिखे, बारबार निवेदन किया, पर व्यवस्था ने मेरे शब्दों को फाइलों में दबा दिया। किसी का ईमेल नहीं, किसी की फाइल नहीं बस इंसान और उसका आत्मसम्मान खड़ा था सत्य की आवाज उठाए। अंततः वेतन जारी हुआ, पर फिर भी प्रताड़ना कम न हुई। जब मैं भोपाल पदस्थ था, वेतन सतना भेज दिया गया ताकि और विलंब हो, और कष्ट मिले। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था यह अहंकार की चोट थी। पर मैं चुप रहा, पराजित नहीं धैर्य की शक्ति के साथ।


सत्य पर खड़ा आदमी अकेला नहीं होता

उस कठिन समय में मैंने समझा कि जीवन में सबसे बड़ा धन पैसा नहीं आत्मसम्मान, सत्य और धैर्य है। मैंने झुकना चुना नहीं, झुकाया नहीं जा सका। संघर्ष कठिन था, रास्ता तंग था, पर अंत में सत्य ही विजयी हुआ। मेरी जेब खाली थी, पर मेरा मन समृद्ध था। मेरे घर में अभाव था, पर गरिमा अडिग थी। मेरे शरीर ने थकान झेली, पर आत्मा अक्षत रही। प्रण था कि न झुकूँगा, न बिकूँगा और मैंने निभाया।

मेरे जीवन का निष्कर्ष

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो वह समय मुझे दुःख नहीं देता बल्कि गर्व देता है। मैंने अपने परिवार के भविष्य के लिए अस्थायी कठिनाई स्वीकार की, पर अपने आत्मसम्मान का सौदा नहीं किया।

मेरा कसूर क्या था?

कभी-कभी मन स्वयं से सवाल करता है आखिर मेरा कसूर क्या था? क्या इसलिए कि मैंने नियमों का पालन किया? क्या इसलिए कि मैंने सच्चाई पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे परखा? क्या इसलिए कि मैंने सत्ता के आगे झुकने से इनकार कर दिया? मुझे दंड मिला, पर उसका कारण आज तक किसी ने नहीं बताया। किसी फ़ाइल में मेरा दोष नहीं लिखा गया, न किसी आदेश में मेरा अपराध दर्ज हुआ फिर भी सज़ा दी गई।

सिर्फ इसलिए कि कुछ अहंकारी अधिकारियों को मेरी ईमानदारी स्वीकार नहीं थी।
सत्ता को आदत होती है झुके हुए लोगों की, और मैंने झुकना नहीं चुना यही मेरा कसूर बन गया।

कर्मचारी तो मैं था, परन्तु आत्मसम्मान मेरा जीवन-सिद्धांत था और शायद यही बात कुछ लोगों को चुभ गई।

धन कमाया जा सकता है पर चरित्र, विश्वास और सत्य इनका मूल्य अनंत है।

और मैं गर्व से कह सकता हूँ: -
दस माह तक वेतन नहीं मिला, पर मैंने अपना आत्मसम्मान नहीं खोया।

 

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