Tuesday, December 2, 2025

 

बाबा का बुढ़ापे मे अपनी बेटी शकुंतला के पास रहना

 

हमारे पिता जी को हम सभी बेटे बाबा बोलते हैं। गाँव में ऐसा ही बोलते हैं सभी लोग। और ऐसा भी पाया जाता है कि बेटे अपने पिता जी को नाम ले कर भी बोलते हैं। हमारे बड़े भैया भी बचपन में पिता जी को नाम ले कर ही बोलते थे। और भीम सिंह ने पिता जी को कभी बाबा या पिता जी कभी नहीं बोला। वह आज भी, पिता जी के मरने के बाद भी ‘पहलवान ‘ कह कर संबोधन करते हैं। मुझे अच्छी तरह ध्यान है कि भीम सिंह ने कभी भी पिता जी को ‘बाबा’ या ‘पिता जी’ नहीं कहा है। ऐसा प्रचलन भी पाया जाता था। मैंने 28/01/2000 में यह आर्टिकल लिखा था एक नोट बुक में। उसकी उम्र लगभग 85 वर्ष की थी। सेहत भी कमजोर होती जा रही थी दिन प्रति दिन। बीमार भी रहते हैं। अब बुढापा हैं उनका। उनको शेष जीवन बिताना है कि इस संसार से जाने कि भी चिंता रहती है उनको। भरा पूरा परिवार है उनका। सात बेटे हैं और तीन बेटियाँ हैं। बेटे – भीम सिंह, चरण सिंह, बदन सिंह  (मैं), महेंद्र सिंह, अमर सिंह, सुरेन्द्र सिंह  (लाला) और नरेन्द्र  (चुनमुन), बेटियाँ – शकुंतला, सुमित्रा और सुनीत  (गुड्डा) हैं। जमीन जायदाद है, किसी भी बात कि कमी नहीं है। सभी बेटे- बेटियाँ सुखी हैं, अपने अपने काम में सुव्यवस्थित हैं, सुखी हैं।

इस वृद्ध अवस्था में चिंताएं बढ़ जाती हैं। शरीर कमजोर होता चला जाता है। हाथ पैर कमजोर हो जाते हैं। इस समय जरूरत कि बेटे सेवा करें। और किसी प्रकार कि समस्या ना होवे। परन्तु इसके एक दम विपरीत हो रहा है। बाबा किसी भी बेटे के पास नहीं रहते हैं। जब कि सात बेटे हैं। परन्तु बाबा किसी बेटे के पास नहीं रहते हैं बल्कि अपनी बड़ी बेटी शकुन्तला के पास रहते हैं। 

प्रश्न यह उठता है कि शकुन्तला के पास क्यों रहते हैं। इसका कारण है कि इस घर में राजनीति फैला रखी है। इसमें जो दिमाग का काम है वह है शकुन्तला के पति तेजपाल का। उसने माध्यम बनाया हुआ है अपनी पत्नी शकुन्तला  (हमारी बहन) को। शकुन्तला मेरे से छोटी है। हम दोनों की बचपन से ही नहीं बनती है। इस माध्यम से हमारे घर में फूट डालना शुरू किया। नए नए कारनामे किये। मेरे छोटे भाई महेंद्र, अमर सिंह, सुरेन्द्र  (लाला) और नरेन्द्र  (चुनमुन) को अपने पक्ष में लिया। हम तीनों – भीम सिंह, चरण सिंह और बदन सिंह (मैं) के खूब जी भर के भरा इन छोटे छोटे चार भाइयों के विरुद्ध। जब पिता जी ही हमारे बाबा अपने बड़े बेटों खिलाफ छोटे बेटों के खिलाफ भरेगा तो एक दृष्टी से वे मान ही लेंगे। और उन लोगों कि मानसिकता भी ऐसी संकीर्ण हो गई या बना दी गई कि ये छोटे छोटे भाई हम बड़े तीनो भाईयों से एक दम दुश्मनों की तरह व्यवहार व जलन करने लगे। और खुले आम दो पार्टी बन गई। इसका मुख्या व छुपा हुआ कारण है – इस परिवार कि आर्थिक स्थिति का कमजोर होना, स्वार्थ भावना और अशिक्षा।

इस राजनीती के चलते बाबा ने छोटे बेटों को, बड़े बेटों के विरुद्ध खूब सिखाया, खूब भरा हमारे खिलाफ। पहले तो हमेशा से ही चरण सिंह के पास रहते थे। चरण सिंह अध्यापक कि नौकरी करते हैं और साथ में घर कि खेती भी संभालते हैं। उसने घर का पूरा जिम्मा ले कर घर को सम्भाला और आर्थिक स्थिति डगमगा रही थी उसे बहुत कुछ संभाला। सभी पूरा क़र्ज़ जो बाबा ने कर रखा था उसे सामान्य स्थिति में लाया गया। घर में जो भी शादी-ब्याह और भात-छूछक आये वे सभी निपटाए। इसके साथ साथ सारी दुश्मनी झेली और अभी तक झेल रहा है। सभी भाई एक एक करके अलग हो गए चरण से ये छोटे भाई। बाबा का इन छोटों के पक्ष में आ जाना उनको दुश्मनी में काफी बढ़ावा दिया है। बाबा ने चरण सिंह पास रहते हुए अनावश्यक नखरे करना शुरू कर दिए। कभी किसी बात पर और कभी किसी अन्य बात पर रूठना, गुस्सा होना शुरू कर दिया। लड़ाई करना शुरू कर दिया। कभी खाना ठीक नहीं, कभी खाना देर से दे दिया, कभी कुछ व कभी कुछ, इस तरह कि बातों से परेशानी में डालना शुरू कर दिया। इन्ही सभी बातों से बात बात पर रूठ कर जाने लगे बाबा, कभी 15-15 दिन के लिए, कभी महीने महीने भर के लिए। कभी बहिन अपनी ननिहाल चले जाते, तो कभी ताहरपुर अपनी ससुराल निकल जाते। वहां पर रहते 15-15 दिन, महीने भर।

बाबा ने अब तो लगभग पिछले दो साल से ये ही हाल बना रखा है कि पलवल रहते हैं अपनी बड़ी बेटी शकुन्तला के पास। वहां से नहीं जाते। सभी ने कह लिया कि बेटी के पास नहीं रहना चाहिए। अच्छा नहीं लगता। उधर शकुन्तला और तेजपाल भी नहीं चाहते कि बाबा उनके पास से जाएं। उनके अपने कोई कारण हो सकते हैं। इसी कारण शकुन्तला नही चाहती कि बाबा उनके यहाँ से कहीं जाएं। वहां रहते रहते कुछ न कुछ इधर उधर की बात फैलाते रहते हैं कि ‘ बाबा अपने नाम कि जमीन छोटे छोटे बेटों ने नाम करा रहे हैं ताकि हम बड़े भाइयों कि और से कुछ प्रतिक्रियाएं हों। इस प्रकार कुछ ना कुछ हरकत करते रहते हैं, ये लोग बाबा को ले कर। न तो शकुन्तला को और ना ही कभी सोचा है कि एक बाप सात बेटों के रहते हुए अपनी बेटी के पास रहता है। यह भी सच है कि बाबा के नखरे भी बहुत हैं, वह स्वयं भी किसी बेटे के पास नहीं ठहरते हैं। महेंद्र और अमर सिंह भी यही कहते हैं कि बाबा उनके पास नहीं ठहरते हैं 

 

पिता का बेटी के घर रहना सोचने की बात -

जब बेटे होते हुए भी पिता बेटी के घर रहने लगते हैं, तो समाज तुरंत कहता है – “यह ठीक नहीं।पर सच यह है कि इसमें केवल पिता दोषी नहीं होते, कहीं न कहीं बेटों की भी कमी होती है।पिता ने पूरी जिंदगी बेटों के लिए मेहनत की, पर अगर बुढ़ापे में वही पिता अपने घर में अकेलापन या उपेक्षा महसूस करें, तो वे वहीं जाएंगे जहाँ अपनापन मिले। बेटी अपने पिता को समझती है, इसलिए उन्हें स्नेह और सम्मान देती है।यह किसी का अपमान नहीं, बल्कि प्रेम और मानवीय भाव का प्रतीक है। समाज को समझना चाहिए कि जब पिता बेटी के घर रहना चुनते हैं, तो यह बेटों के लिए चेतावनी है कि कहीं वे अपने पिता को वह स्थान देना भूल गए हैं जिसके वे हकदार हैं

 

महेंद्र कहता है कि जमीन नहीं लूँगा बाबा की, रोटी खाते जाएँ, फिर भी नहीं ठहरते हैं। इसी प्रकार अमर सिंह कहता है कि उसके पास बाबा नहीं ठहरते हैं। सुरेन्द्र के पास, आजकल वह ही जोतता है बाबा कि जमीन, सुरेन्द्र को चाहिए वाही रखे बाबा को अपने पास। मेरा यह भी कहना है कि बाबा चुनमुन के पास रहे जा कर। उसको भी तो पता चले क्या होती हैं जिम्मेदारी। अनेकों बार, बार बार सभी ले कह लिया है, रिश्तेदारों ने, गाँव के बैठने-उठने वालों ने कह लिया कि बेटी के पास रहना ठीक नहीं लगता। परन्तु बा हैं तो किसी भी नहीं सुनते है।

ना तो शकुन्तला को शर्म आती है और ना ही बद्बबा को शर्म आती है कि बेटों को छोड़ कर बेटी के पास रह रहे हैं। बाबा के इस कार्य को हमारे परिवार का इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा।

 

 

 

 

 

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बाबा का बुढ़ापे मे अपनी बेटी शकुंतला के पास रहना

हमारे पिता जी को हम सभी बेटे बाबा बोलते हैं। गाँव में ऐसा ही बोलते हैं सभी लोग। और ऐसा भी पाया जाता है कि बेटे अपने पिता जी को नाम ले कर भी बोलते हैं। हमारे बड़े भैया भी बचपन में पिता जी को नाम ले कर ही बोलते थे। और भीम सिंह ने पिता जी को कभी बाबा या पिता जी कभी नहीं बोला। वह आज भी, पिता जी के मरने के बाद भी ‘पहलवान ‘ कह कर संबोधन करते हैं। मुझे अच्छी तरह ध्यान है कि भीम सिंह ने कभी भी पिता जी को ‘बाबा’ या ‘पिता जी’ नहीं कहा है। ऐसा प्रचलन भी पाया जाता था। मैंने 28/01/2000 में यह आर्टिकल लिखा था एक नोट बुक में। उसकी उम्र लगभग 85 वर्ष की थी। सेहत भी कमजोर होती जा रही थी दिन प्रति दिन। बीमार भी रहते हैं। अब बुढापा हैं उनका। उनको शेष जीवन बिताना है कि इस संसार से जाने कि भी चिंता रहती है उनको। भरा पूरा परिवार है उनका। सात बेटे हैं और तीन बेटियाँ हैं। बेटे – भीम सिंह, चरण सिंह, बदन सिंह  (मैं), महेंद्र सिंह, अमर सिंह, सुरेन्द्र सिंह  (लाला) और नरेन्द्र  (चुनमुन), बेटियाँ – शकुंतला, सुमित्रा और सुनीत  (गुड्डा) हैं। जमीन जायदाद है, किसी भी बात कि कमी नहीं है। सभी बेटे- बेटियाँ सुखी हैं, अपने अपने काम में सुव्यवस्थित हैं, सुखी हैं।

इस वृद्ध अवस्था में चिंताएं बढ़ जाती हैं। शरीर कमजोर होता चला जाता है। हाथ पैर कमजोर हो जाते हैं। इस समय जरूरत कि बेटे सेवा करें। और किसी प्रकार कि समस्या ना होवे। परन्तु इसके एक दम विपरीत हो रहा है। बाबा किसी भी बेटे के पास नहीं रहते हैं। जब कि सात बेटे हैं। परन्तु बाबा किसी बेटे के पास नहीं रहते हैं बल्कि अपनी बड़ी बेटी शकुन्तला के पास रहते हैं। 

प्रश्न यह उठता है कि शकुन्तला के पास क्यों रहते हैं। इसका कारण है कि इस घर में राजनीति फैला रखी है। इसमें जो दिमाग का काम है वह है शकुन्तला के पति तेजपाल का। उसने माध्यम बनाया हुआ है अपनी पत्नी शकुन्तला  (हमारी बहन) को। शकुन्तला मेरे से छोटी है। हम दोनों की बचपन से ही नहीं बनती है। इस माध्यम से हमारे घर में फूट डालना शुरू किया। नए नए कारनामे किये। मेरे छोटे भाई महेंद्र, अमर सिंह, सुरेन्द्र  (लाला) और नरेन्द्र  (चुनमुन) को अपने पक्ष में लिया। हम तीनों – भीम सिंह, चरण सिंह और बदन सिंह (मैं) के खूब जी भर के भरा इन छोटे छोटे चार भाइयों के विरुद्ध। जब पिता जी ही हमारे बाबा अपने बड़े बेटों खिलाफ छोटे बेटों के खिलाफ भरेगा तो एक दृष्टी से वे मान ही लेंगे। और उन लोगों कि मानसिकता भी ऐसी संकीर्ण हो गई या बना दी गई कि ये छोटे छोटे भाई हम बड़े तीनो भाईयों से एक दम दुश्मनों की तरह व्यवहार व जलन करने लगे। और खुले आम दो पार्टी बन गई। इसका मुख्या व छुपा हुआ कारण है – इस परिवार कि आर्थिक स्थिति का कमजोर होना, स्वार्थ भावना और अशिक्षा।

इस राजनीती के चलते बाबा ने छोटे बेटों को, बड़े बेटों के विरुद्ध खूब सिखाया, खूब भरा हमारे खिलाफ। पहले तो हमेशा से ही चरण सिंह के पास रहते थे। चरण सिंह अध्यापक कि नौकरी करते हैं और साथ में घर कि खेती भी संभालते हैं। उसने घर का पूरा जिम्मा ले कर घर को सम्भाला और आर्थिक स्थिति डगमगा रही थी उसे बहुत कुछ संभाला। सभी पूरा क़र्ज़ जो बाबा ने कर रखा था उसे सामान्य स्थिति में लाया गया। घर में जो भी शादी-ब्याह और भात-छूछक आये वे सभी निपटाए। इसके साथ साथ सारी दुश्मनी झेली और अभी तक झेल रहा है। सभी भाई एक एक करके अलग हो गए चरण से ये छोटे भाई। बाबा का इन छोटों के पक्ष में आ जाना उनको दुश्मनी में काफी बढ़ावा दिया है। बाबा ने चरण सिंह पास रहते हुए अनावश्यक नखरे करना शुरू कर दिए। कभी किसी बात पर और कभी किसी अन्य बात पर रूठना, गुस्सा होना शुरू कर दिया। लड़ाई करना शुरू कर दिया। कभी खाना ठीक नहीं, कभी खाना देर से दे दिया, कभी कुछ व कभी कुछ, इस तरह कि बातों से परेशानी में डालना शुरू कर दिया। इन्ही सभी बातों से बात बात पर रूठ कर जाने लगे बाबा, कभी 15-15 दिन के लिए, कभी महीने महीने भर के लिए। कभी बहिन अपनी ननिहाल चले जाते, तो कभी ताहरपुर अपनी ससुराल निकल जाते। वहां पर रहते 15-15 दिन, महीने भर।

बाबा ने अब तो लगभग पिछले दो साल से ये ही हाल बना रखा है कि पलवल रहते हैं अपनी बड़ी बेटी शकुन्तला के पास। वहां से नहीं जाते। सभी ने कह लिया कि बेटी के पास नहीं रहना चाहिए। अच्छा नहीं लगता। उधर शकुन्तला और तेजपाल भी नहीं चाहते कि बाबा उनके पास से जाएं। उनके अपने कोई कारण हो सकते हैं। इसी कारण शकुन्तला नही चाहती कि बाबा उनके यहाँ से कहीं जाएं। वहां रहते रहते कुछ न कुछ इधर उधर की बात फैलाते रहते हैं कि ‘ बाबा अपने नाम कि जमीन छोटे छोटे बेटों ने नाम करा रहे हैं ताकि हम बड़े भाइयों कि और से कुछ प्रतिक्रियाएं हों। इस प्रकार कुछ ना कुछ हरकत करते रहते हैं, ये लोग बाबा को ले कर। न तो शकुन्तला को और ना ही कभी सोचा है कि एक बाप सात बेटों के रहते हुए अपनी बेटी के पास रहता है। यह भी सच है कि बाबा के नखरे भी बहुत हैं, वह स्वयं भी किसी बेटे के पास नहीं ठहरते हैं। महेंद्र और अमर सिंह भी यही कहते हैं कि बाबा उनके पास नहीं ठहरते हैं 

 

पिता का बेटी के घर रहना सोचने की बात -

जब बेटे होते हुए भी पिता बेटी के घर रहने लगते हैं, तो समाज तुरंत कहता है – “यह ठीक नहीं।पर सच यह है कि इसमें केवल पिता दोषी नहीं होते, कहीं न कहीं बेटों की भी कमी होती है।पिता ने पूरी जिंदगी बेटों के लिए मेहनत की, पर अगर बुढ़ापे में वही पिता अपने घर में अकेलापन या उपेक्षा महसूस करें, तो वे वहीं जाएंगे जहाँ अपनापन मिले। बेटी अपने पिता को समझती है, इसलिए उन्हें स्नेह और सम्मान देती है।यह किसी का अपमान नहीं, बल्कि प्रेम और मानवीय भाव का प्रतीक है। समाज को समझना चाहिए कि जब पिता बेटी के घर रहना चुनते हैं, तो यह बेटों के लिए चेतावनी है कि कहीं वे अपने पिता को वह स्थान देना भूल गए हैं जिसके वे हकदार हैं।

 

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