भाई का आगमन, बहन का अभिमान
विवाह का अवसर केवल उत्सव नहीं होता; यह रिश्तों की बारीकियों, भावनाओं की गहराइयों और परंपराओं की गरिमा को फिर से जी लेने का समय होता है। हमारे समाज में भात भरने की परंपरा भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक है। जब भाई बहन के घर भात लेकर आता है, तो वह केवल चावल नहीं लाता—वह अपने साथ मायके की पहचान, अपनत्व और सम्मान भी लेकर आता है।
मेरी पत्नी राजवती के जीवन में यह क्षण विशेष महत्व रखता था। बचपन में ही माँ चल बसीं, सगे भाई-बहन भी जीवित नहीं रहे। पिता ने पुनर्विवाह किया और सौतेले भाई प्रवीण का जन्म हुआ। समय कठिन था—माता मानसिक रूप से अस्थिर, पिता भी अब इस संसार में नहीं रहे। पाँच एकड़ ज़मीन पट्टे पर देकर किसी तरह जीवन चलता है।
ऐसे हालात में भी प्रवीण, जो अभी मात्र 14–15 वर्ष का था, 21 फ़रवरी 2000 को अपनी बहन के घर भात लेकर आया। गरीबी ने उसे झुकाया नहीं, बल्कि रिश्ते ने उसे खड़ा किया। यह उसके संस्कार, उसकी सच्चाई और बहन के प्रति उसके सम्मान का प्रमाण था।
कभी मन में विचार आया था कि भात का न्योता न दें। जीवन में कुछ अवसरों पर अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, और मन में शिकायतें बनी रहीं। पर जब दिल से सोचा, तो समझ आया—दोष व्यक्ति का नहीं, परिस्थिति का था। मेरे ससुर सरल और सीधे थे, पर समाज और वातावरण ने उन्हें उलझा दिया था; उनके मन में बुराई कभी नहीं थी।
और जब वह छोटा भाई द्वार पर खड़ा था, तब सारा मनमुटाव हवा हो गया। उस क्षण की गरिमा बहुत बड़ी थी। द्वार पर खड़ी राजवती की आँखें भर आईं। उसने अपने भाई का आदरपूर्वक स्वागत किया। उस पल उसकी आँखों में केवल खुशी नहीं थी—वहाँ वर्षों का दर्द, यादें, तन्हाई और अचानक लौट आया अपनापन भी था। उसे लगा मानो उसका मायका फिर से उसके सामने उपस्थित है, माँ-पिता का स्नेह फिर छू गया हो।
भात की थाली में वस्तुएँ कम थीं, पर भावनाएँ अनमोल थीं। वह क्षण केवल रीति का पालन नहीं था, बल्कि रिश्ते की पुनर्स्थापना था—सम्मान और प्रेम का उत्सव था।
उस दिन विश्वास फिर दृढ़ हुआ कि—रिश्ते खून से नहीं, दिल की निष्ठा से निभते हैं। और जब भावना सच्ची हो, तो सादगी भी स्वर्ण बन जाती है।
**संदेश:**
जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, यदि मन से रिश्ते निभाए जाएँ तो वे समय की साक्षी बनकर अमर हो जाते हैं।
No comments:
Post a Comment