Tuesday, December 2, 2025

 

जमीन का मौखिक बटवारा

हमारी माँ के मरने के बाद 1986 में सभी भाइयों की जमीन का मौखिक बटवारा,  हमारे सबसे बड़े भाई भीम सिंह द्वारा किया गया। दो जगह चक्क हैं हमारे अर्थात दो जगह जमीन है – एक जगह घुरौन्द वाला चक्क और दूसरा तेजावाला चक्क। घुरौन्द पर लगभग 28 एकड़ और तेजावाले पर लगभग 12 एकड़ जमीन है। मौखिक बटवारा 8 हिस्सों में किया गया – बाबा  (पिता जी) ने भी अपना हिस्सा लिया। बाबा ने अपना पूरा हिस्सा घुरौन्द पर एक ही जगह लिया। और बाकि सभी भाइयों को दोनों जगह दिए गए। घुरौन्द पर लगभग 3 एकड़ और तेजवाले पर लगभग 1.5 एकड़ जमीन आई। इस तरह मौखिक बटवारा किया गया। मैं उस समय खजुराहो में अपनी नौकरी पर था, मेरी अनुपस्थिति में यह हुआ।

चरण ने मेरे खेत बदल लिए- चरण ने मेरे खेत बिना मेरे से पूछे बदल लिए और अपने वाले खेत मेरे लिए छोड़ दिए। और यहाँ तक उसमें मकान भी बना लिए, तीन मकान। मुझे बाद में पता चलता है कि मेरे खेत बदल लिए हैं। किसी ने कुछ नहीं कहा और ना ही किसी ने मुझे बताया भी। अपनी मर्जी का करता आया है चरण हमेशा। अब जब मैंने इच्छा प्रकट की कि मेरे वाले खेत ही मुझे दिए जाएं तो नहीं दिय्रे और मैंने भी संतोष कर लिया। चरण से ज्यादा तो उसका पुत्र टिंकी उससे भी आगे निकल गया। कभी मेरे खेतों का पट्टा भ नहीं दिया मुझे। और जब हिसाब करने लिए बोला तो सुनना ही नहीं है। अंत में 2021 में म्किने अपने खेत वापिस ले लिए टिंकी से। यहाँ तक भी तेजवाले मेरे खेत तो टिंकी किसी दूसरे को पट्टे पर देता रहता था, उसका पट्टा भी मुझे नहीं देता था।

और अब लाला के बारे में- एक एकड़ खेत में से मिटटी उठवा कर बेच दी 1999 के आस पास और किसी ने रोका तक नहीं। महेंद्र ने जरूर ही बड़े भैया भीम सिंह कहा कि लाला को रोकिये, परन्तु भीम सिंह ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। इस प्रकार यह एक प्रकार से मौन रह कर विवाद को बढ़ावा ही दिया भीम सिंह। अब उस खेत में, जब से मिटटी उठवाई है उसमें कोई भी फसल नहीं होती है। वर्षो वर्षों से घटा ही हो रहा है लाला को। समझने को तैया ही नहीं है लाला। और जब पूरी तरह से बटवारा होगा खेतों का, इस गड्ढे वाले खेत को कोई भी नहीं लेना चाहेगा।

बहुत उलझन है हमारी जमीन में। बाबा अपने हिस्से की जमीन को अपनी बड़ी पुत्री के नाम करा गया। शायद अमर सिंह का इसमें हाथ हो कि बाद में शकुन्तला से वह इस जमीन को अपने नाम करा लेगा। दुर्भाग्य से अमर सिंह की हत्या हो गई।  और फिर खेल हुआ षड्यंत्र का। ट्रेक्टर जो बाबा के नाम पर था वह चरण ने बेच दिया परन्तु उसके लिखित पढ़त कार्यवाही नहीं कराई गई, बेच तो दिया परन्तु ट्रेक्टर नाम अभी भी बाबा के नाम पर ही चल रहा था। और फिर उस ट्रेक्टर से दुर्घटना हो जाती है, उससे 4 आदमी मर जाते हैं। कोर्ट से आदेश आया कि मरे हुए लोगों को हर्जाना दिया जाएगा ट्रेक्टर के मालिक के द्वारा। अमर स्वयं एक वकील था, उसने इस केस की कार्यवाही प्रारंभ तो की परन्तु उसने बीच में कोर्ट की तारीख पर ही जाना बंद कर दिया, इस लिए हम केश हार गए। उसका कहना था कि वह एक वकील है उसको इसकी फीस चाहिए घर वालों से। उस समय घर का मालिक चरण था, ट्रेक्टर भी चरण ने ही बेचा, वकील की फीस भी चरण को देना चाहिए था। उसने फीस दी नहीं, और लोगों ने रुची ली नहीं, अंततः केस हार गए हम। अब क्लेम भरने के नोटिस भी आने लगे शकुन्तला के पास, क्योंकि अब जमीन शकुन्तला के नाम थी। शकुन्तला ने क्लेम भरने से मना कर दिया। कई बार जमीन की नीलामी की कार्यवाही भी हुई। उस समय किसी कारण से नीलामी नहीं हो सकी। फिर शुरू हुआ असली लालच के षड्यंत्र का खेल। भीम सिंह और उसके पुत्र भगत सिंह ने एक योजना बनाई। सब भाई लोग क्लेम का पैसा भर दें और जितना कोई पैसा भर देगा उसे उतनी ही जमीन शकुन्तला के द्वारा जमीन देनी उतरवानी होगी। भीम सिंग को मालुम था था कि बदन सिंह, लाला और अमर सिंह के बच्चों के पास पैसा नहीं है। इसलिए यह जमीन इनको नहीं मिलेगी। अब रहे भीम सिंह, चरण, महेंद्र और चुनमुन – इन्होने कुछ भरने के लिए सहमती दिखाई।  पैसा भर दिया गया। चुनमुन ने अपना पैसा महेंद्र से वापिस ले लिया और उसके बदले शकुन्तला से जो जमीन का हिस्सा मिलना है वह महेंद्र अपने नाम करा ले। अब जमीन भगत सिंह  (भीम सिंह ने अपने बेटे के नाम कराई, क्योंकि पैसा भगत सिंह ने भरा था) और महेंद्र के नाम करा दी गई, दिया गए पैसे के अनुपात में। बाद में टिंकी के नाम करा दी, उसी प्रकार पैसे के अनुपात में। और बाकि भाई बदन सिंह, अमर सिंह, लाला और चुनमुन के नाम शकुन्तला ने कोई जमीन नहीं कराई। यदि दुसरे भाई तैयार नहीं होते तो भगत साड़ी जमीन अपने नाम करा लेता ही। नैतिकता नहीं देखी गई यहाँ पर, क्योंकि संपत्ति का मामला है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया।  

नैतिकता की बात देखिये –

·       पहले तो बाबा की और से – बाबा ने बेटी को क्यों दी जमीन – यहाँ नैतिकता गिर गई। बेटी को नहीं दे कर, सभी बेटों को देनी चाहिए थी – जैसे कि परम्परा चली आ रही है। यदि बेटी को देनी थी तो सभी बेटियों को देनी चाहिए थी। दूसरी बेटियों  (सुमन  (सुमित्रा) और गुड्डा  (सुनीता) को क्यों नहीं दी जमीन ? कहाँ गई नैतिकता ! 

·       अब बेटी की नैतिकता – यहाँ भी दिखाई दी। यदि बाबा जमीन किसी कारण वश अपनी बेटी शकुन्तला के नाम कर गए तो बेटी को चाहिए की वह बेटी इस जमीन को अपने सभी भाइयों के नाम करा दे। शकुन्तला ने ऐसा नहीं कराया। पहले तो शकुन्तला को मना कर देना चाहिए था कि बाबा बेटों को छोड़ कर अपनी एक ही बेटी के नाम नहीं कराइए इस जमीन को। परन्तु लालच। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया। बड़ी ख़ुशी से इस बेटी ने बाबा से जमीन अपने नाम करा ले। और फिर शकुन्तला यह चाहे कि भाइयों से अच्छे सम्बन्ध बने रहे –यह संभव नहीं हो सकता। या तो लालच या अच्छे सम्बन्ध।

·       अमर सिंह भाई की नैतिकता- यदि अमर सिंह पूरी निष्ठा से इस ट्रेक्टर की दुर्घटना के केस को लड़ता तो केस हार ही नहीं सकते थे हम। पैसे के लालच में, फीस के लालच में उसने केस बीच में ही छोड़ दिया और केस हारना ही था, जब अमर सिंह पेशी पर उपस्थित ही नहीं हुआ। दूसरे किसी भाई ने ध्यान ही नहीं दिया – बहित बड़ी लापरवाही है यह। - यहाँ अमर सिंह की नैतिकता असफल हुई। चरण को फीस अवश्य ही देनी चाहिए थी, वह अपने ही स्वार्थ लालच में और छोटे भाइयों को कुछ समझता ही नहीं था। चरण की गैर जिम्मेदारी कि उसने ट्रेक्टर के बिक्री की लिखित पढ़त क्यों नहीं कराई और फीस भी नहीं दी गई। यहाँ पर चरण की नैतिकता असफल हुई और गैर जिम्मेदाराना हुआ। छोटे भाइयों को कुछ नहीं बताना, कोई सलाह नहीं लेना और एक अहंकार कि वह तो घर का मालिक है – ये सब नैतिकता चरण की असफल हुई है।

·       जिन भाइयों के पास शकुन्तला वाली जमीन है उनकी नैतिकता- भीम सिंह पुत्र भगत सिंह, महेंद्र और टिंकी  (चरण का पुत्र) के पास यह विवादित शकुन्तला की जमीन है। यदि इच्छा शक्ति हो तो पूर्व में हुई गलती को अभी भी सुधारा जा सकता है। वह ऐसे कि ये लोग इस जमीन को सभी भाइयों में बराबर बाँट दे और जो जिसका पैसा है उसको वापस दे दिया जाए।  मैंने भगत सिंह से बात की थी इस बारे में। भगत सिंह ने कहा – ठीक है परन्तु आज के रेट से वापिस कर दी जाये। यह तो जमीन खरीदना हुआ। जमीन ही आज के रेट से खरीदी जाएगी तो क्या यही जमीन खरीदी जाएगी ! कहीं अच्छी दूसरी जगह नहीं खरीद लेंगे। कोई तैयार नहीं है इस बात पर। कहाँ रह गई नैतिकता। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया। लालच के साथ कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है।

·       अभी भी कुछ जमीन  (एक एकड़ और एक चौथाई एकड़) शकुन्तला के नाम पर है। पहले तो चुनमुन कोशिश कर रहा था कि यह शकुन्तला उसके नाम कर दे। और भीम पहले कि तरह इस जेमाएं के विषय में बहुत चिंतित है कि उसको कुछ ना कुछ तो मिले। परन्तु शकुन्तला इसको किसी के नाम नहीं कर रही है। इस जमीन पर क़र्ज़ है बैंक का। लाला ने ट्रेक्टर जब लिया था तो शकुन्तला की इस जमीन पर क़र्ज़ लिया था शकुन्तला ने। वर्षों हो गए, लाला ने क़र्ज़ नहीं भरा और बैंक का नोटिस शकुन्तला के नाम आ रहा है।  शकुन्तला परेशान है। यहाँ लाला की नैतिकता असफल हो जाती है। क़र्ज़ लिया है तो भरना चाहिए।

जमीन का बटवारा – यह भी एक ऐसा विषय है जहां पर नैतिकता असफल होती रही है। पढ़ा लिखा परिवार है हमारा। परन्तु समझदारी के कोई भी काम नहीं हो रहे हैं। 1986 के बाद मौखिक बटवारा हुआ था। एक तो बाबा ने हिस्सा लिया – उसको नहीं लेना चाहिए था। सारी की सारी समस्याएँ यहीं से प्रारंभ हुई हैं। बाबा कि जमीन शकुन्तला को जाना, फिर शकुन्तला ने कुछ ही भाई या भतीजों को देना। जमीन तो सभी को ही मिलनी चाहिए थी। मौखिक बटवारे में अनियमतता होना और चरण द्वारा खेत बदन लेना व अपनी मर्जी का खेत लेना – यह सब हुआ और अभी भी बटवारे की समस्या बना हुआ है। मैंने कोशिश की थी वर्ष 2012 में, बटवारे का प्रारूप बनाया गया। शकुन्तला का खेत भी भाइयों की तरह दोनों चक्कों पर देना प्रारूप में था। और शकुन्तला ने जो दूसरों को जमीन दी है उसमें से यह भाई और भतीजे जमीन लेंगे। मेरा सुझाव सभी ने सराहा और सहमती भी हो गई। परन्तु भीम सिंह  (भगत सिंह की ओर से, पिता हैं उसके) अकेले ने मेरे इस सुझाव को मना कर दिया। उसको सड़क के सामने भी शकुन्तला का बटवारा चाहिए ताकि भगत सिंह भी उसमे से जमीन मिल जाए। थोड़ा सा भी त्याग नही है भीम सिंह में। और अभी तक बटवारा नहीं हो पाया है। सही में बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया।  अंत में महेंद्र द्वारा तह्सील अदालत में केस डाला है कि जमीन का बटवारा कर दिया जावे। कोई नैतिकता नहीं है कहीं भी।   

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