Tuesday, December 2, 2025

 लेखक – बदन सिंह चौहान                                                                                रविवार, 30 नवम्बर 2025

एक टूटे हुए परिवार की गूँज

रिंकल की अधूरी कहानी और एक मासूम बच्ची का अकेलापन

कभी-कभी दुख सिर्फ किसी एक व्यक्ति का नहीं होतावह पूरे घर, पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों के दिलों पर छाप छोड़ जाता है। रिंकल की कहानी भी ऐसी ही एक गहरी, दर्द भरी, सवालों से भरी कहानी हैएक ऐसी कहानी जिसमें एक भाई की पीड़ा, एक पिता की बेबसी, एक बच्ची का भविष्य, और रिश्तों की सच्चाई सब कुछ एक साथ मिलता है।

1. रिंकलएक ऐसा बेटा, जो बीच रास्ते में ही थक गया

धर्मेंद्र उर्फ़ रिंकल, चरण सिंह के बेटे और बड़े भाई का लाड़ला, जीवन के बोझ से लड़ते-लड़ते 2007 में टूट गया।
यह टूटना सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं थायह पूरा परिवार बिखेर गया।
जब रिंकल ने यह कदम उठाया, वह अकेला नहीं गया।
वह अपने साथ

  • माता-पिता के सपने
  • भाई के सहारे
  • पत्नी सविता का पूरा जीवन – अकेला
  • और एक नवजात बेटी का भविष्य

सब कुछ अधूरा छोड़ गया।

2. दोतीन महीने की बच्चीऔर घर छोड़कर चली गई माँ

रिंकल की मृत्यु के बाद, उसकी पत्नी अपनी दोतीन महीने की बच्ची को लेकर घर से चली गई। उसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखान अपनी बेटी के दादादादी को, न ताऊताई को, न उस घर की चौखट को जहाँ रिंकल के कदमों की गूँज आज भी जीवित है।

आज वह बच्ची 18 साल की है। एक उम्रजहाँ उसे परिवार का हाथ चाहिए था, जहाँ उसे दादादादी के आशीर्वाद चाहिए थे, जहाँ उसे अपने पिता का नाम गर्व से लेना चाहिए था।

लेकिन उसके पास क्या है? सिर्फ एक सवालमैं किसकी हूँ?”

3. 29 नवम्बर 2025—उस बच्ची की शादी

शादीजो हर लड़की के जीवन का सबसे सुंदर दिन होता है, उसके लिए शायद सबसे कठिन दिन बन जाएगा।

क्योंकि

  • न दादी के आँसू होंगे,
  • न दादा का स्नेह,
  • न ताऊ का कंधा,
  • न परिवार का आशीर्वाद।

वह अकेली है बहुत अकेली।

वह सिर्फ बेटी नहीं है
वह रिंकल का एकमात्र निशान भी है।
उस मासूम को कौन-सा दोष था?
वह किस गलती की कीमत आज तक चुका रही है?

रिंकल की पुत्री मोनिका की शादी 29 नवम्बर 2025 को हर्ष नाम के लड़के से आज पूर्ण हो गई। यह लड़का अहरवां गाँव के श्री सुनील और श्रीमती बाला का पुत्र है। विवाह अपनी नानी के घर गाँव चांदहट से हुआ और विवाह का स्थल अमर वाटिका रहा।

उसके सगे दादा-दादी, सगे ताऊ-ताई, ताऊ टिंकी के पुत्र और पुत्रीकोई नहीं गया शादी में। उन्हें तो सिर्फ़ ज़मीन-जायदाद से मतलब था और पहले ही ले ली उन्होंने। हमारा भाई लाला गया था शादी में।

मेरी भी बहुत इच्छा थी जाने कीपरन्तु लोकलाज के कारण नहीं गया। समाज के सामने मेरा सामना होगा तो मैं कैसे टिक पाऊँगा? क्या परिचय दूंगा अपना? उसी सवाल ने मेरे कदम रोक लिए। मैंने लाला को कह दिया था कि मेरी ओर से 500 रुपये कन्यादान कर देना।

बहुत पीड़ा होती है यह सोचकरक्या बीती होगी मोनिका के दिल पर? जब उसके मन में आया होगा कि कोई तो उसका बाप होगाआज उसका भी बाप होता तो गले से लगाता, आशीर्वाद देता, सिर पर हाथ फेरताउसके जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण दिन पर खुशियों की सौगात लेकर खड़ा होता।

उसकी आँखों में शायद एक पल को यह ख्याल आया होगा कि काशमेरा भी कोई होता जो मुझे अपने दिल से लगा लेता। पर वहाँ कोई नहीं था मेरामैं भी तो उसका छोटा दादा हूँ, उसका अपना खून, उसका अपना अपनापन

एक बाप ही तो होता है जो बेटी को विदा करते समय खुद टूटकर भी उसे मजबूत बनाता है। पर आज वह पल भी मोनिका के हिस्से में नहीं आया।

दिल के किसी कोने में यह चुभन मेरे लिए ज़िंदगी भर का घाव बन गई है। मैं छोटा दादा होकर भी दादा न बन सकायही पछतावा आज मेरी आत्मा को काट रहा है।

समाज क्या सोचेगा, लोग क्या कहेंगेइसी डर ने मोनिका की आँखों में शायद एक अधूरी तलाश छोड़ दी। काशमैं उसके सिर पर हाथ रख पाता। काशवह मुझे देखकर गर्व महसूस कर पाती। काशआज मैं कह पाता—“बिटिया, मैं हूँ यहाँऔर हमेशा रहूँगा।

लेकिन यह काशही मेरे हिस्से आया।

मेरी ये आँखें नम हैंदिल टूट गया हैपर दुआ सिर्फ़ यही है

हमारी मोनिका हमेशा खुश रहेउसके जीवन में कभी कोई खालीपन न आएऔर ईश्वर उसे वह सारी खुशियाँ दे देजो मैं उसे न दे सका

विदाई के समय जब उसकी आँखें भर आई होंगी, जब उसने अपने हाथों से चावल पीछे फेंके होंगे, तब उसके दिल में एक टीस ज़रूर उठी होगी—“मेरे पापा कहाँ हैं?” उसका मन शायद उस भीड़ में एक चेहरा ढूँढ रहा होगा, जिसे देखकर वह जी भरकर रो सके, जिसके गले लगकर वह आखिरी बार बच्ची बन सके। लेकिन वहाँ कोई नहीं था उसका सहारा बनकर खड़ा होने वाला। उसकी नानी ने उसे विदा किया, रिश्तेदारों ने कंधा दिया, पर वह एक कंधा जिसकी वह हक़दार थीवह खाली रह गया। शायद उसने हल्की-सी गर्दन मोड़कर देखना भी चाहा होकि कहीं दूर से ही सही, मेरे पापा आ जाएँपरन्तु नहीं, वह तो स्वर्ग में था, कैसे आता।

4. ससुराल छोड़ने  के बाद सविता (रिंकल की पत्नी)

रिंकल की मृत्यु के बाद बात सिर्फ रिश्तों की नहीं रही
पैसे का हिसाब शुरू हो गया।

कुछ लाख रुपये का हिसाब हुआ, फासले हुए,
जमीनें इधर-उधर हुईं,
नाम बदले गए,
और रिश्ते
रिश्ते तो बिल्कुल खत्म कर दिए गए।

लेकिन एक सवाल आज भी हवा में तैर रहा है

क्या पैसा ही सब कुछ है?
क्या खून का रिश्ता कुछ भी नहीं?

5. रिंकल की जमीनऔर सवाल की चुभन

आज जब कहा जा रहा है कि रिंकल की जमीन, उसकी बेटी या पत्नी के नाम नहीं है,
और उसे बड़े बेटे टिंकी के नाम करने की बात हो रही है

एक दर्द भरा सवाल उठता है

क्या यह न्याय है?
या उस बच्ची के साथ दूसरा अन्याय?

एक बच्ची जिसने पिता खोया,
माँ से दूरी पाई,
परिवार का साया नहीं मिला
क्या अब उसे अपने पिता की अंतिम निशानी से भी दूर कर दिया जाए?

अगर रिंकल आज होता
क्या वह अपनी बेटी का हक किसी और की झोली में डाल देता?
क्या वह चाहता कि उसका खून, उसकी संतान, बिना अधिकार के जीए?
नहींकभी नहीं।

6. खून के रिश्ते और दर्द का सच

रिश्ते कभी पैसे से नहीं चलते। रिश्ते दिल से चलते हैं। और जिस बच्ची का खून में रिंकल है
वह किसी का पराया कैसे हो सकती है?

दादा-दादी का प्यार, ताऊ का साया, परिवार की छतउसे मिलना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

अगर यह सब उससे छीन लिया गया,
तो दोष किसका है?
समय का?
परिस्थिति का?
या इंसानों के दिलों का?

7. वह बच्चीऔर उसका अकेलापन

किसी भी लड़की की शादी में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है
परिवार का होना।

लेकिन यहाँ
उस बच्ची की सगाई से लेकर फेरे तक,
हर कदम पर खामोशी साथ होगी।

  • न दादा का हाथ पकड़कर मंडप में जाना,
  • न दादी की आँखों में खुशी के आँसू,
  • न ताऊ का कंधा,
  • न परिवार की भीड़

उसके जीवन की चौखट पर
बस अकेलापन ही लिखा गया है

8. दर्द भरा निष्कर्ष न्याय किसे मिलेगा?

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं यह सवाल है समाज से।

क्या हम खून के रिश्तों को सिर्फ दस्तावेज़ों और जमीन के नाम से मापते हैं?
क्या एक मासूम बच्ची का हक इतनी आसानी से छीन लेना उचित है?
क्या रिंकल की रूह यही चाहेगी?

रिंकल की मौत ने परिवार को तोड़ा
पर उस बच्ची की जिंदगी ने सबकी परीक्षा ले ली है।

अब फैसला सिर्फ जमीन का नहीं है
फैसला इंसाफ का है।
फैसला रिश्तों के मूल्य का है।
फैसला मानवता का है।

और इतिहास गवाह है
पैसा खत्म हो जाता है,
जमीनें बदल जाती हैं,
पर अन्याय की चीखें सदियों तक गूँजती रहती हैं।

......

रिंकल की कहानीरिश्तों, दर्द और न्याय की तलाश

 

एक परिवार और अचानक टूटता जीवन 

इस परिवार के दिन कभी हँसी और उम्मीद से भरे थे। चरन सिंह के घर में सबकुछ सामान्य चलता था, और रिंकल परिवार के उन सदस्यों में से था जो घर को शक्ति और सहारा देते थे। वह बड़े बेटे नहीं थे, पर परिवार के भीतर उनकी मौजूदगी सबके दिलों में विशेष स्थान रखती थी। लेकिन 2008 का वह अंधेरा दिन इस घर के लिए किसी तूफ़ान से कम न था, जब रिंकल ने अचानक अपने जीवन को समाप्त कर दिया। उसके जाने के बाद घर के आँगन में एक ऐसी खामोशी उतर आई जो सालों गुजरने के बाद भी मिट नहीं सकी। रिंकल का खो जाना सिर्फ एक व्यक्ति का खोना नहीं था, बल्कि परिवार की आत्मा में एक गहरा घाव था।

 

दोतीन महीने की बच्ची और मायके चली गई माँ 

रिंकल की मौत के समय उसकी बच्ची मुश्किल से दोतीन महीने की थी। इतना छोटा बच्चा जो न समझ सकता था, न किसी को पुकार सकता था, न यह जान सकता था कि उसके पिता अब कभी वापस नहीं आएँगे। इसी कठिन समय में रिंकल की पत्नी उसे अपनी गोद में लेकर मायके चली गई। यह उसका निजी निर्णय थाशायद उसकी मजबूरी भीपर इसके साथ ही नानानानी पर जिम्मेदारी का एक बड़ा पहाड़ टूट पड़ा। उन्होंने ही उस मासूम की दुनिया को सँभाला। उसी घर में उसने पहली बार बोलना सीखा, चलना सीखा, स्कूल का रास्ता जाना और दुनिया को समझना शुरू किया। नानानानी ने उसे सिर्फ पाला ही नहीं, बल्कि जीवन की हर छोटी-बड़ी जरूरत अपने बूढ़े कंधों पर उठाई। बीमारी, पढ़ाई, मुश्किलें, जिम्मेदारियाँहर कदम पर वे ही उसके माता-पिता बने रहे। वह बच्ची हर साल बड़ी हुई, पर उसके पीछे खड़ी सबसे मजबूत दीवार सिर्फ उसके नानानानी रहे, और यही सच्चाई उसका पूरा संसार बन गई।

 

बड़ी होती बच्ची और खून के रिश्तों की चुप्पी 

आज वह बच्ची अठारह साल की हो चुकी है। युवती बन चुकी है, समझ रखती है, दुनिया की बातें समझती है, पर खून के रिश्तों की ओर से आई चुप्पी उसके दिल में अब भी एक खाली जगह बनकर बैठी है। विवाह का समय नजदीक है—29 नवंबर 2025 उसकी नई जिंदगी की शुरुआत का दिन हैपर पिता के परिवार की ओर से न कोई आशीर्वाद आया, न कोई हाथ बढ़ा, न कोई अपनापन। वह हर त्यौहार, हर महत्वपूर्ण दिन, हर सफलता, हर डर में एक ही बात समझती रही कि खून के रिश्तों ने उसे बिना देखे ही दूरी चुन ली। और यह चुप्पी सिर्फ चुप्पी नहींएक प्रश्न है, एक पीड़ा है, एक अनुत्तरित शिकायत है।

 

चरन सिंह का मन और न्याय की कसौटी 

अब सवाल जमीन और हक का है। रिंकल की जमीन उसके नाम पर नहीं बची। हिसाबकिताब का फासला उसके जाने के बाद पूरा कर दिया गया था। और अब जब जमीन चरन सिंह के हाथ में है, वह यह सोच रहे हैं कि इसे अपने बड़े बेटे टिंकी के नाम कर दें या इसमें हिस्सेदारी उस बच्ची को भी दें जो आज रिंकल की इकलौती निशानी है। यह निर्णय सिर्फ संपत्ति का नहींयह निर्णय रिश्तों, अन्याय और न्याय, खून और इंसानियत के बीच खड़े एक व्यक्ति का है। क्या वह बच्ची, जिसने अपने पिता का चेहरा भी नहीं पहचाना, दादा-दादी का सहारा नहीं पाया, ताऊ के स्नेह की कमी झेलीक्या आज उसके अधिकार पर परिवार की आँखें बंद कर लेनी चाहिए? क्या उसे सिर्फ इसलिए हक से वंचित कर देना चाहिए कि उसकी माँ मायके चली गई थी? क्या पिता की मृत्यु के साथ ही उस बच्ची का अधिकार, उसका सम्मान, उसका भविष्य भी खत्म हो जाता है? यह प्रश्न किसी अदालत का नहींयह चरन सिंह के अंतःकरण का प्रश्न है। और यही सवाल यह तय करेगा कि इस परिवार में रिश्ते बड़े हैं, या पैसा बड़ा है।

 

उस बच्ची का क्या कसूर था 

अंत में सबसे गहरी सच्चाई यही उभरकर सामने आती है कि उस बच्ची का क्या कसूर था। न उसने किसी से कुछ छीना, न किसी को दुख दिया, न कोई गलत कदम उठाया। उसके जन्म ने किसी को पीड़ा नहीं दी, लेकिन फिर भी पीड़ा उसी ने सबसे अधिक झेली। वह ऐसे संसार में आई जहाँ उसके हिस्से में सिर्फ खोखली चुप्पियाँ और दूरियाँ थीं। उसने पिता को खोया, माता-पिता के परिवार का साया खोया, और खून के रिश्तों का अपनापन भी खो दिया। बच्चे कभी दोषी नहीं होते, दोष उन परिस्थितियों का होता है जिन्हें बड़े लोग अपने फैसलों, अपनी जिद, अपने स्वार्थ या अपने डर से बनाते हैं। और उसी का बोझ सबसे ज्यादा उस मासूम के दिल पर पड़ता है जो न जीवन समझता है, न रिश्तों की उलझनें। अगर परिवार में न्याय और इंसानियत सचमुच जीवित हैं, तो सबसे पहला हक उसी बच्चे को मिलना चाहिए जिसने जीवन का सबसे कठिन सफर बिना किसी गलती के तय किया है। पैसा कमाया जा सकता है, जमीन बाँटी जा सकती है, पर एक बच्चे के दिल में पैदा हुआ अकेलापन, उपेक्षा और अधिकारहीनता कभी नहीं भरी जा सकती। इस कहानी की गहरी सीख यही हैगलती बच्चों की नहीं होती; गलती हम बड़े करते हैं जब हम उनके हिस्से के प्यार, सुरक्षा और अधिकार को अपने निर्णयों की भीड़ में कहीं खो देते हैं।

 

मंगलवार, 2 दिसम्बर 2025

टूटे रिश्तों का कन्‍यादान

आज सुबह लगभग 8:30 बजे छोटा भाई सुरेंद्र मेरे पास आया। उसकी आँखों में थकान और शब्दों में पुराने रिश्तों का बोझ स्पष्ट था।

उसने बताया कि रिंकू की बेटी की शादी में हमारे बड़े भाई भीम सिंह और भाई चरण, जो उस बच्ची के सगे दादा हैं, ने कन्यादान के रूप में प्रत्येक 11,000 रुपये दिए। कन्यादान की नोटबुक में केवल राशि दर्ज थी कौन दे कर आया, यह पता नहीं था। वह व्यक्ति आया, रुपये दिए, लिखवाए और बिना किसी से मिले चुपचाप चला गया। ना किसी आशीर्वाद का स्पर्श, ना किसी अपनापन का अहसासकेवल औपचारिकता।

पर असली दर्द वहाँ था, जहाँ वह बेटी खड़ी थी। उसके पिता तो तब इस दुनिया में नहीं थे,
जब वह सिर्फ 2–3 महीने की थी। उसने अपनी छोटी-सी जिंदगी में पिता की गोद कभी महसूस नहीं की, कभी उसका प्यार नहीं पाया।

 आज विदाई के उस पल में वह बेटी खूब रोई। उसके आँसू उसके भीतर बसी अधूरी यादों की गूँज थे। वह सोच रही थी कि उसके पिता आज भी उसके जीवन की सबसे बड़ी अनुपस्थिति हैं।

और उसकी माँ भी रोई। वह याद कर रही थी अपने पति को खोने का दिन, जब उसे अपनी बेटी को विदा करना पड़ा था। उसकी आँखों में वही पुरानी पीड़ा झलक रही थी, जो आज भी उस पल को दोहरा रही थी।

और वही दादा जिसने कभी उसे पुकारा भी नहीं, जिसने कभी उसके लिए कदम उठाए नहीं, वही आज कन्यादान करने की हिम्मत कैसे कर गया?

कन्यादान के वे रुपये केवल औपचारिकता बनकर रह गए। रिश्ते रुपये से नहीं निभते।
वे दिल से निभाए जाते हैं, अपनापन जताने और प्यार दिखाने से निभते हैं।

उस बेटी के आँसू कह रहे थे — “कहाँ है वह पिता, जिसकी गोद में मैं पलती?” और माँ की हर सिसकी कह रही थी बेटियाँ विदा नहीं होतीं, माँ के भीतर से एक हिस्सा टूटकर अलग होता है।

आज यह कन्यादान केवल रस्म नहीं था। यह उस दर्द की चुभन थी, जो जिंदगीभर साथ रहेगी। यह उन टूटे हुए रिश्तों का स्मरण था, जिन्हें समय ने नकारा, और अवसर ने फिर भी मौका दिया। कन्यादान के वे रुपये रस्म बनकर रह गए, पर उस विदाई में छुपी पीड़ा, वह आँसू, वह हृदयस्पर्शी क्षण सिखाते हैं कि रिश्तों की असली कीमत पैसे नहीं, प्यार और अपनापन है।

कन्यादान के वे रुपये रस्म बनकर रह गए, पर क्या यही सब कुछ है, क्या पैसा ही रिश्तों की पूरी कीमत तय करता है और अपनी संतान की ममता, उसका प्यार और अपनापन क्या उनकी कोई कीमत नहीं है।

मैंने आशीर्वाद के रूप में 500 रुपये का कन्यादान कर दिया था , मई नहीं गया था , सुरेन्द्र से कह दिया था कि मेरी और से कर दे और उसने बताया कि उसने लिखवा दिया है।





 

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