बदन सिंह चौहान
08 नवम्बर 2025 स्थान – मेरा गाँव अल्लीका,
जिला
पलवल (हरियाणा)
बेटे की शादी – एक याद और एक संघर्ष
वर्ष 2007, दिनांक
7 जुलाई — मेरे बेटे का विवाह भोपाल स्थित मध्यप्रदेश पर्यटन निगम की इकाई होटल
पलाश रेज़िडेंसी में संपन्न हुआ। बारातियों के ठहरने की व्यवस्था होटल लेक व्यू
अशोक में की गई थी। उस समय मैं इंदौर में पदस्थ था। यह भी अपने आप में एक कहानी है
— मेरा तबादला भोपाल से इंदौर मंत्री महोदया की नोट के आधार पर कर दिया गया था, जो
सामान्यतः ऐसा नहीं होता। कारण स्पष्ट था — मुख्यालय के कुछ अधिकारियों से मेरे
संबंध सहज नहीं रहे थे। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी अधिकारी के विरुद्ध कुछ लिखना
नहीं है, बस इतना ही कहना है कि उस समय जो मानसिक पीड़ा मुझे झेलनी पड़ी, वह आज भी
याद आती है।
बारात से ठीक पहले
शादी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं।
बारात की रवानगी से मात्र दस मिनट पहले मेरी सरकारी गाड़ी तत्काल प्रभाव से वापस
ले ली गई। उस क्षण मुझे अत्यंत कष्ट हुआ। एक पिता, जो अपने बेटे की शादी में
भावनाओं से भरा हुआ था, उसके सामने यह स्थिति बहुत तकलीफ़देह थी।
सहयोग नहीं, अड़चनें मिलीं
निगम की ओर से किसी प्रकार का सहयोग नहीं
मिला। उल्टा जहाँ तक संभव हुआ, अड़चनें डाली गईं। निगम का एक आदेश था कि निगम के
कर्मचारियों के बच्चों की शादी में, निगम की इकाइयों में lodging और boarding पर 50% की छूट दी जाएगी — वह भी केवल एक
बच्चे की शादी तक सीमित। यह “एक बच्चे की शादी” का नियम मुझे आज तक समझ नहीं आया।
मैंने तत्कालीन प्रबंधक संचालक श्री अश्विनी लोहानी से निवेदन कर 50% की अनुमति
प्राप्त कर ली।
छूट पर नई शर्तें
इसके बाद भी रुकावटें समाप्त नहीं हुईं।
कहा गया कि छूट केवल एक बार भोजन पर मिलेगी। कुछ समय पहले रिंग सेरेमनी के अवसर
पर, मैंने निगम की विंड एंड वेव्स इकाई में कुछ लोगों को भोजन कराया था, जिसमें
बहुत ही छोटा डिस्काउंट मिला था। अब उसे आधार बनाकर कहा गया कि मैंने पहले छूट ले
ली है, अतः विवाह में अब नहीं मिलेगी।
संघर्षमय पत्राचार
मुख्यालय और मेरे बीच कई पत्राचार हुए।
मुझे विवश किया गया कि शादी में छूट तभी मिलेगी जब रिंग सेरेमनी के डिस्काउंट की
राशि वापस जमा कराई जाए। बिल पर तो 50% डिस्काउंट ही था और कुल बिल की राशि भी
बहुत थोड़ी थी। मैंने कई पत्र लिखे — यह तर्क देते हुए कि रिंग सेरेमनी भी विवाह
का ही हिस्सा है। विवाह की व्यस्तताओं के बीच मैं निगम से संघर्षमय पत्राचार करता
रहा। मैंने अनेक उदाहरण और संदर्भ दिए, कुछ मामलों में तो इसी प्रकार की छूट पूरे
आयोजन पर दी गई थी, पर उनका उत्तर आज तक नहीं मिला।
भेदभाव और पीड़ा
मैंने यह भी उदाहरण दिया कि कुछ ही माह
पूर्व एक अधिकारी की बेटी के विवाह समारोह में कार्यक्रम पूरे सप्ताह चला था, और
उस पूरे समय का डिस्काउंट स्वीकृत हुआ था। वहीं दूसरी ओर, मुझे केवल एक समय के
भोजन और एक ही रात्री के ठहराव पर छूट दी गई। बहुत से पत्र लिखे, लेकिन कुछ नहीं
हुआ। अन्ततः मुझे रिंग सेरेमनी का वह छोटा-सा डिस्काउंट राशि वापस भरनी पड़ी, तब
जाकर शादी के बिल में छूट स्वीकृत की गई।
पिता का मन
जिसके हाथ में शक्ति होती है, फिर किसी
और की नहीं चलती। कितना कष्ट हुआ होगा उस पिता को, जो अपने बेटे की शादी कर रहा
था, और साथ ही इस प्रकार के संघर्ष से गुजर रहा था। एक ओर बेटे का विवाह, दूसरी ओर
नियमों और संवेदनाओं की ठोकरें — यह अनुभव जीवनभर की स्मृति बन गया।
अनुभव की सीख
समय बीत गया, बेटा अब अपने परिवार में
खुश है। उसकी मुस्कान ही उस कठिन समय की सबसे बड़ी पूँजी है। इस पूरे प्रसंग ने
मुझे यह सिखाया कि जब व्यवस्था में संवेदना का स्थान नहीं होता, तब उसका अर्थ खो
जाता है। नियम आवश्यक हैं, पर उनमें यदि मानवीयता न हो, तो उनका उद्देश्य अधूरा रह
जाता है।
· “जहाँ कर्तव्य हो वहाँ भावना भी हो, जहाँ व्यवस्था हो वहाँ संवेदना भी — तभी किसी संस्था का हृदय जीवित रह सकता है।”
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दो शादियाँ – दो अनुभव
जीवन में कुछ अवसर ऐसे होते हैं जो केवल
पारिवारिक नहीं, बल्कि हमारे अनुभवों और भावनाओं की गहराई को भी
उजागर करते हैं। मेरी पुत्री और पुत्र — दोनों की शादियाँ मेरे
जीवन के ऐसे ही दो अवसर रहे, जिनमें मुझे मध्यप्रदेश पर्यटन निगम से दो बिल्कुल अलग प्रकार
के अनुभव प्राप्त हुए।
मेरी पुत्री की शादी,
जैसा कि पहले भी मैंने लिखा है, मेरे जीवन का एक अत्यंत
भावुक और अविस्मरणीय क्षण था। उस समय मैं पर्यटन निगम में विशेष कर्तव्य अधिकारी (OSD) के रूप में कार्यरत था। निगम के प्रबंधक संचालक श्री अश्विनी लोहानी जी थे — जिन्होंने स्नेह, संवेदना और परिवार जैसे भाव से मुझे सहयोग
दिया।
शादी का आयोजन निगम की
प्रसिद्ध इकाई विंड एंड वेव्स में हुआ था। पूरी व्यवस्था अत्यंत गरिमामय रही। हर छोटे से छोटे पहलू पर
ध्यान दिया गया — मेहमानों का स्वागत गुलाब के फूलों से हुआ, प्रत्येक अधिकारी को विशेष दायित्व सौंपा गया, और आयोजन के हर हिस्से में निगम परिवार की आत्मीयता झलक रही थी। उस समय
मुझे लगा कि मैं वास्तव में एक परिवार के बीच हूँ। निगम के वरिष्ठ अधिकारी, अभियंता, और अधीनस्थ सभी ने जिस तरह से सहयोग और स्नेह
दिया, उसने इस आयोजन को एक अविस्मरणीय स्मृति बना दिया।
पुत्र की शादी -
किन्तु, जब समय आया मेरे पुत्र की शादी का, तो अनुभव बिलकुल भिन्न रहा।वह भी मेरे जीवन का एक बड़ा और महत्वपूर्ण अवसर था, किंतु इस बार निगम की
ओर से वह अपनापन और सहयोग कहीं दिखाई नहीं दिया।जिस संस्था ने एक समय बेटी की शादी
को अपने परिवार का उत्सव बना दिया था, वही संस्था इस बार निर्जीव-सी प्रतीत हुई। ना किसी ने विशेष रुचि ली, ना कोई समन्वय हुआ।
शादी के दिन कोई
अधिकारी उपस्थित होकर मेहमानों का स्वागत करता दिखाई नहीं दिया, न ही किसी ने गुलाब का फूल थमाया।जहाँ पहले हर कोने में स्नेह और व्यवस्था
की झलक थी, वहीं इस बार असंवेदनशीलता और उदासीनता का अनुभव हुआ।
मुझे यह अंतर भीतर तक छू गया।एक ही निगम, एक ही परिवार, पर दो अवसरों पर दो बिल्कुल विपरीत अनुभव। मैं किसी से शिकायत
नहीं करना चाहता, पर यह अनुभव इस बात का संकेत अवश्य देता है कि संवेदनशीलता और मानवीय जुड़ाव किसी भी संगठन की
असली ताकत होते हैं।
मेरी बेटी की शादी में मिले सहयोग को मैं आज भी
श्रद्धा से याद करता हूँ — वह एक परिवारिक उत्सव था। और बेटे की शादी का अनुभव मुझे यह सोचने पर विवश करता है कि समय के साथ संवेदनाओं की वह गरमी क्यों और कैसे ठंडी पड़ गई।
फिर भी, मैं उस पुराने दौर की
आत्मीयता और अपने सहयोगियों के स्नेह के प्रति आज भी कृतज्ञ हूँ।
आशा करता हूँ कि आने
वाले समय में निगम अपने उसी मानवीय और पारिवारिक
स्वरूप को फिर से जीवित करेगा, जिसके कारण वह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक परिवार कहलाता
था।
वही मैं बदन सिंह, वही निगम और वही सभी
लोग - पर अंतर केवल संवेदनाओं का है, जो पहले साथ थीं और अब कहीं खो गई हैं।
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